आलू की खेती

आलू की खेती — बीज चयन से भंडारण तक

आलू की सफल खेती के लिए संपूर्ण मार्गदर्शन: सही बीज से लेकर उन्नत तकनीकों और भंडारण तक की जानकारी पाएं।

डॉ. अनिल कुमार वर्मा प्रकाशित 29 मई 2026 12 मिनट का पठन अपडेट: 29 मई 2026

सही बीज का चुनाव और उनकी विशेषताएँ

आलू की खेती में सफलता की पहली सीढ़ी सही और गुणवत्तापूर्ण बीज का चुनाव है। अच्छे बीज रोगमुक्त, स्वस्थ और प्रमाणित होने चाहिए। भारत में कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जिन्हें विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है। प्रमुख किस्मों में कुफरी पुखराज, कुफरी ज्योति और कुफरी बहार शामिल हैं, जो उत्तर भारत के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। ये किस्में न केवल अच्छा उत्पादन देती हैं, बल्कि रोगों के प्रति भी प्रतिरोधी क्षमता रखती हैं।

कुफरी पुखराज: यह एक अगेती किस्म है जो 75-90 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके कंद बड़े, अंडाकार और हल्के पीले रंग के होते हैं। यह किस्म उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों द्वारा पसंद की जाती है क्योंकि यह उच्च उपज देती है (लगभग 300-400 क्विंटल प्रति एकड़)। यह किस्म सूखे और पाले के प्रति कुछ हद तक सहनशील है, जिससे किसानों को विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार मिल जाती है।

कुफरी ज्योति: यह मध्यम अवधि की किस्म है जो आमतौर पर 90-110 दिनों में पकती है। इसके कंद सफेद, अंडाकार और मध्यम आकार के होते हैं। यह किस्म हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष रूप से लोकप्रिय है। कुफरी ज्योति पछेती झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी है, जो आलू की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। इसकी उपज क्षमता भी अच्छी है, लगभग 250-350 क्विंटल प्रति एकड़। इसकी गुणवत्ता इसे चिप्स बनाने के लिए भी उपयुक्त बनाती है।

कुफरी बहार: यह भी एक मध्यम अवधि की किस्म है, जो 90-100 दिनों में परिपक्व होती है। इसके कंद सफेद, अनियमित आकार के और मध्यम से बड़े होते हैं। यह किस्म उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। कुफरी बहार की खासियत इसकी उच्च उपज क्षमता (300-380 क्विंटल प्रति एकड़) और अच्छी भंडारण क्षमता है। यह किस्म खाने और प्रसंस्करण दोनों के लिए अच्छी मानी जाती है। किसान अपनी मिट्टी और जलवायु के अनुसार इन किस्मों में से चुनाव कर सकते हैं।

  • कुफरी पुखराज: अगेती (75-90 दिन), उच्च उपज (300-400 क्विंटल/एकड़), बड़े कंद।
  • कुफरी ज्योति: मध्यम (90-110 दिन), पछेती झुलसा प्रतिरोधी, 250-350 क्विंटल/एकड़।
  • कुफरी बहार: मध्यम (90-100 दिन), उच्च उपज (300-380 क्विंटल/एकड़), अच्छी भंडारण क्षमता।

आलू की बुवाई का सही समय और तरीका

आलू की बुवाई का सही समय क्षेत्र और जलवायु पर निर्भर करता है, लेकिन उत्तर भारत में आमतौर पर अक्टूबर के पहले सप्ताह से नवंबर के मध्य तक का समय उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में तापमान आलू के विकास के लिए आदर्श होता है, जिससे कंदों का उचित विकास होता है। अगर बुवाई बहुत देर से की जाती है, तो पाले और रोगों का खतरा बढ़ जाता है और अगर बहुत जल्दी की जाती है, तो उच्च तापमान के कारण कंदों का विकास प्रभावित हो सकता है। बुवाई से पहले खेत की गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बनाना आवश्यक है।

रिज़ यानी मेड़ पर बुवाई का तरीका आलू की खेती के लिए सबसे प्रभावी और लोकप्रिय तरीका है। इस विधि में खेत में 15-20 सेंटीमीटर ऊंची और 60-75 सेंटीमीटर चौड़ी मेड़ें बनाई जाती हैं। इन मेड़ों के ऊपर 20-25 सेंटीमीटर की दूरी पर आलू के बीज बोए जाते हैं, और पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75-80 सेंटीमीटर रखी जाती है। बीज को 5-7 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। मेड़ पर बुवाई करने से जल निकासी बेहतर होती है, जिससे कंदों को सड़ने से बचाया जा सकता है और मिट्टी में हवा का संचार भी अच्छा रहता है, जो कंदों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

बुवाई के लिए बीज का आकार बहुत मायने रखता है। आमतौर पर 25-50 ग्राम वजन वाले, 2-3 आंख वाले साबुत या कटे हुए बीज का उपयोग किया जाता है। कटे हुए बीज को तुरंत नहीं बोना चाहिए; उन्हें फफूंदनाशक जैसे मैनकोजेब (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) के घोल से उपचारित करके छाया में 24-48 घंटे सुखाने के बाद बोना चाहिए ताकि संक्रमण से बचा जा सके। प्रति एकड़ लगभग 8-10 क्विंटल बीज की आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि बीज प्रमाणित स्रोतों से प्राप्त हों ताकि रोगमुक्त फसल मिल सके। खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट डालने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। रासायनिक उर्वरकों में, बुवाई के समय 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस और 100 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालें और शेष आधी नाइट्रोजन बुवाई के 30-40 दिन बाद निराई-गुड़ाई के समय दें।

  • बुवाई का समय: अक्टूबर का पहला सप्ताह से नवंबर का मध्य (उत्तर भारत)।
  • मेड़ पर बुवाई: 60-75 सेमी चौड़ी मेड़ें, 20-25 सेमी बीज दूरी, 75-80 सेमी पंक्ति दूरी।
  • बीज उपचार: फफूंदनाशक से उपचारित कर 24-48 घंटे सुखाएं।
  • उर्वरक: 10-15 टन गोबर की खाद, 120N:80P:100K प्रति एकड़।

सिंचाई और पोषण प्रबंधन

आलू की फसल को उसकी वृद्धि अवधि के दौरान उचित सिंचाई और पोषण की आवश्यकता होती है ताकि अधिकतम उपज प्राप्त की जा सके। आलू की फसल को लगभग 5-7 सिंचाई की आवश्यकता होती है, जो मिट्टी के प्रकार और जलवायु पर निर्भर करती है। पहली हल्की सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद दी जाती है, जिससे अंकुरण में मदद मिलती है। इसके बाद, महत्वपूर्ण अवस्थाओं जैसे कंद निर्माण (बुवाई के 30-45 दिन बाद) और कंद विकास (बुवाई के 60-75 दिन बाद) पर सिंचाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन अवस्थाओं में मिट्टी में नमी की कमी से कंदों का विकास रुक सकता है और उपज में कमी आ सकती है।

सिंचाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि खेत में पानी जमा न हो, खासकर मेड़ वाली विधि में। अधिक पानी से कंदों में सड़न और मृदा जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। फव्वारा और ड्रिप सिंचाई प्रणाली आलू की खेती के लिए बहुत प्रभावी साबित हुई हैं, क्योंकि ये पानी की बचत करती हैं और पौधों को सीधे जड़ों में पानी पहुंचाती हैं। इन प्रणालियों से पानी का समान वितरण होता है और मिट्टी में नमी का स्तर स्थिर बना रहता है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसान अब पानी बचाने और पैदावार बढ़ाने के लिए आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपना रहे हैं।

पोषक तत्वों का सही प्रबंधन आलू की उच्च गुणवत्ता और उपज के लिए महत्वपूर्ण है। बुवाई के समय दिए गए बेसल उर्वरक के अलावा, फसलों को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है। बुवाई के 30-40 दिन बाद, जब पौधे लगभग 15-20 सेंटीमीटर के हो जाएं, तो बची हुई नाइट्रोजन की आधी मात्रा (लगभग 60 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़) और थोड़ी मात्रा में पोटाश (30-40 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति एकड़) का छिड़काव करना चाहिए। यह 'अर्थिंग अप' या मिट्टी चढ़ाने के समय किया जाता है, जिससे कंदों को सीधे धूप से बचाया जा सकता है और उनके विकास को बढ़ावा मिलता है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को भी दूर करना चाहिए। जस्ते (जिंक) और बोरॉन की कमी उत्तर भारत की मिट्टी में आम है, और इनकी पूर्ति जिंक सल्फेट (25 किलोग्राम प्रति एकड़) और बोरेक्स (5 किलोग्राम प्रति एकड़) के माध्यम से की जा सकती है। foliar spray (पर्ण स्प्रे) के रूप में भी पोषक तत्व दिए जा सकते हैं, खासकर जब पौधे तनाव में हों।

  • सिंचाई: 5-7 बार, कंद निर्माण और विकास अवस्था में महत्वपूर्ण।
  • सिंचाई विधि: फव्वारा और ड्रिप सिंचाई पानी बचाने में प्रभावी।
  • नाइट्रोजन: बुवाई के 30-40 दिन बाद (अर्थिंग अप के साथ)।
  • सूक्ष्म पोषक तत्व: जिंक और बोरॉन की कमी के लिए प्रबंधन।

रोग और कीट नियंत्रण: एकीकृत दृष्टिकोण

आलू की फसल को विभिन्न रोगों और कीटों से खतरा होता है, जो उपज को काफी हद तक कम कर सकते हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) दृष्टिकोण अपनाना सबसे प्रभावी तरीका है। इसमें सांस्कृतिक प्रथाएं, जैविक नियंत्रण और रासायनिक नियंत्रण का विवेकपूर्ण उपयोग शामिल है। प्रमुख रोगों में अगेती झुलसा और पछेती झुलसा शामिल हैं, जबकि माहू (एफिड) एक प्रमुख कीट है।

अगेती झुलसा (Early Blight): यह Alternaria solani नामक फंगस के कारण होता है। पत्तियों पर छोटे, भूरे धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में गहरे रंग के हो जाते हैं और इनमें संकेंद्रित वलय बनते हैं। यह अक्सर फसल की शुरुआती अवस्था में या पुराने पत्तों पर दिखाई देता है। इसकी रोकथाम के लिए मैनकोजेब (Mancozeb) @ 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या क्लोरोथालोनिल (Chlorothalonil) @ 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव 10-15 दिनों के अंतराल पर करें। बुवाई से पहले बीजों का उपचार भी इसे रोकने में मदद करता है।

पछेती झुलसा (Late Blight): यह Phytophthora infestans नामक फंगस से होता है और आलू की फसल के लिए सबसे विनाशकारी रोग है, खासकर ठंडे और नम मौसम में। पत्तियों पर पानी से भीगे हुए, गहरे भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं, जिनके चारों ओर पीलापन होता है। इसकी रोकथाम के लिए, मेटालैक्सिल + मैनकोजेब (Metalaxyl + Mancozeb) @ 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या साइमोक्सैनिल + मैनकोजेब (Cymoxanil + Mancozeb) @ 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव हर 7-10 दिनों पर करें, खासकर जब रोग के लक्षण दिखें। प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव (जैसे कुफरी ज्योति) भी महत्वपूर्ण है।

माहू (Aphids): यह छोटे, हरे रंग के कीट होते हैं जो पत्तियों की निचली सतह पर जमा होकर रस चूसते हैं। ये आलू के कई वायरल रोगों जैसे पोटैटो लीफ रोल वायरस (PLRV) और पोटैटो वाई वायरस (PVY) के वाहक भी होते हैं, जो फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं। माहू के नियंत्रण के लिए, इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) @ 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या थायमेथोक्साम (Thiamethoxam) @ 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। जैविक नियंत्रण के लिए लेडीबग बीटल जैसे शिकारी कीटों का उपयोग किया जा सकता है। नीम आधारित कीटनाशकों का उपयोग भी प्रभावी हो सकता है। नियमित रूप से फसल की निगरानी करना और शुरुआती लक्षणों पर कार्रवाई करना महत्वपूर्ण है। खरपतवार नियंत्रण भी माहू के प्रकोप को कम करने में मदद करता है।

  • अगेती झुलसा: मैनकोजेब या क्लोरोथालोनिल का छिड़काव।
  • पछेती झुलसा: मेटालैक्सिल + मैनकोजेब या साइमोक्सैनिल + मैनकोजेब का छिड़काव।
  • माहू: इमिडाक्लोप्रिड या थायमेथोक्साम का छिड़काव; जैविक नियंत्रण भी संभव।
  • नियमित निगरानी और स्वच्छ खेती महत्वपूर्ण।

आलू की खुदाई और कटाई के बाद के तरीके

आलू की खुदाई तब करनी चाहिए जब पौधे लगभग परिपक्व हो जाएं और उनके पत्ते पीले पड़ने लगें या सूख जाएं। यह आमतौर पर बुवाई के 75-120 दिनों बाद होता है, जो किस्म पर निर्भर करता है। खुदाई से लगभग 10-15 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए ताकि मिट्टी सूख जाए और कंदों की बाहरी त्वचा सख्त हो जाए। इससे कंदों को नुकसान कम होता है और उनकी भंडारण क्षमता बढ़ती है। खुदाई मैनुअली फावड़े या खुरपे से की जा सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर खेती के लिए पोटैटो डिगर (Potato Digger) या मशीन का उपयोग करना अधिक कुशल होता है।

खुदाई करते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कंदों को कम से कम नुकसान पहुंचे। कटे-फटे या चोटिल कंदों की भंडारण क्षमता कम हो जाती है और उनमें रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है। खुदाई के बाद, आलू को सीधे धूप में नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें छाया में 2-3 घंटे सूखने देना चाहिए ताकि उनकी बाहरी सतह पर सूखी मिट्टी हट जाए और छोटे-मोटे घाव भर जाएं। इसे 'क्योरींग' (Curing) कहा जाता है। क्योरींग के बाद, क्षतिग्रस्त, हरे या कीटग्रस्त कंदों को अलग कर देना चाहिए ताकि वे अच्छे कंदों को प्रभावित न करें।

खुदाई के बाद आलू को तुरंत पैक नहीं करना चाहिए। उन्हें अच्छी तरह से हवादार जगह पर 2-3 सप्ताह के लिए रखना चाहिए, जिसे 'प्री-स्टोरेज' या 'कंडिशनिंग' अवधि कहा जाता है। इस दौरान, कंदों की बाहरी त्वचा और दृढ़ हो जाती है और उनकी आंतरिक गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके बाद, आलू को किस्म के अनुसार अलग-अलग ग्रेड में छांटना चाहिए। छोटे, मध्यम और बड़े आकार के कंदों को अलग-अलग करने से बाजार में बेहतर मूल्य मिलता है। इस प्रक्रिया को 'ग्रेडिंग' कहते हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ग्रेडिंग करते समय भी आलू को अत्यधिक चोट से बचाना चाहिए।

क्षतिग्रस्त और हरे कंदों को बाजार में बेचने से बचें या उन्हें पशु आहार के लिए उपयोग करें। स्वस्थ और अच्छी गुणवत्ता वाले कंदों को ही भंडारण या सीधे बाजार में भेजें। यह सुनिश्चित करता है कि आपके उत्पाद को सर्वोत्तम मूल्य मिले और आपको अच्छी reputaion भी मिले। कटाई के बाद के सही तरीके अपनाकर किसान अपनी फसल का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं और नुकसान को कम कर सकते हैं।

  • खुदाई: जब पत्ते पीले पड़ें, बुवाई के 75-120 दिन बाद।
  • सिंचाई बंद करें: खुदाई से 10-15 दिन पहले।
  • क्योरींग: खुदाई के बाद छाया में 2-3 घंटे सुखाएं।
  • ग्रेडिंग: आकार के अनुसार छांटें और क्षतिग्रस्त कंदों को अलग करें।

भंडारण और मंडी मूल्य की जानकारी

आलू एक ऐसी फसल है जिसे उचित भंडारण की आवश्यकता होती है ताकि इसे लंबे समय तक ताजा रखा जा सके और बाजार में उतार-चढ़ाव का लाभ उठाया जा सके। भारत में कोल्ड स्टोरेज (Cold Storage) आलू के भंडारण का सबसे आम और प्रभावी तरीका है। कोल्ड स्टोरेज में आलू को आमतौर पर 2-4 डिग्री सेल्सियस तापमान और 85-90% सापेक्ष आर्द्रता पर रखा जाता है। इस तापमान पर आलू निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं, जिससे उनमें अंकुरण और सड़न की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि आलू कई महीनों तक अच्छी गुणवत्ता में बने रहें।

कोल्ड स्टोरेज में रखने से पहले, आलू को अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए और किसी भी क्षतिग्रस्त या सड़ी हुई गांठ को हटा देना चाहिए। कोल्ड स्टोरेज में आलू को ढेर में या बोरियों में रखा जा सकता है, लेकिन पर्याप्त वायु संचार सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। कभी-कभी अंकुरण रोकने के लिए क्लोरप्रोफाम (CIPC) जैसे अंकुरण रोधी रसायनों का भी उपयोग किया जाता है, खासकर जब भंडारण की अवधि लंबी हो। सही भंडारण तकनीकों का उपयोग करके किसान आलू को 6-8 महीने तक सुरक्षित रख सकते हैं, जिससे उन्हें फसल के अच्छे दाम मिलने तक इंतजार करने का मौका मिलता है।

भारत के विभिन्न राज्यों में आलू के मंडी मूल्य में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, जो मांग, आपूर्ति, मौसम और स्थानीय उत्पादन पर निर्भर करता है। उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल आलू के प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता राज्य हैं। आमतौर पर, कटाई के तुरंत बाद (दिसंबर-जनवरी) कीमतें कम होती हैं, जब बाजार में नई फसल की भरमार होती है। इस समय आलू का मूल्य 8-12 रुपये प्रति किलोग्राम (थोक) हो सकता है।

गर्मी के महीनों (मार्च-जून) में कीमतें थोड़ी बढ़ जाती हैं क्योंकि आपूर्ति कम हो जाती है और भंडारण में रखे आलू बाजार में आते हैं। इस अवधि में कीमत 15-25 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकती है। दिवाली और अन्य त्योहारों के दौरान भी मांग बढ़ने से कीमतें ऊपर जाती हैं। अगस्त-अक्टूबर के अंत तक, जब नई फसल आने वाली होती है, तो कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू की कीमतें 25-35 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे अधिक हो सकती हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे मंडी भाव पर लगातार नजर रखें और अपनी उपज को ऐसे समय बेचें जब उन्हें सर्वाधिक लाभ मिल सके। e-NAM (इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट) जैसे प्लेटफॉर्म भी किसानों को विभिन्न मंडियों में वास्तविक समय की कीमतें जानने में मदद करते हैं।

  • भंडारण: कोल्ड स्टोरेज (2-4°C, 85-90% आर्द्रता)।
  • अंकुरण रोधी रसायन: क्लोरप्रोफाम (CIPC) का उपयोग संभव।
  • कीमतें: कटाई के तुरंत बाद कम (8-12 रु/किग्रा), गर्मी में बढ़ोतरी (15-25 रु/किग्रा), देर से 25-35 रु/किग्रा।
  • e-NAM: मंडी भाव जानने के लिए उपयोगी।
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लेखक एवं समीक्षक

अकु

डॉ. अनिल कुमार वर्मा

मुख्य कृषि संपादक

Ph.D. कृषि विज्ञान (Agronomy), G.B. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

22+ वर्ष अनुभव पंतनगर, उत्तराखंड

डॉ. वर्मा को फसल उत्पादन, मृदा प्रबंधन और सिंचाई तकनीकों में 22 वर्षों का शोध अनुभव है। वे ICAR की कई परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं और किसान मित्र की संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया का नेतृत्व करते हैं।

यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 29 मई 2026

संपादकीय टीम से संपर्क करें

स्रोत एवं संदर्भ

  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — फसल उत्पादन तकनीक दिशानिर्देश ICAR, नई दिल्ली
  2. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — योजना दस्तावेज़ भारत सरकार
  3. कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) — विस्तार सेवाएँ ICAR-ATARI

यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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