गन्ने का लाल सड़न (Red Rot) — 'गन्ने का कैंसर' कहलाने वाली बीमारी का पूरा इलाज
गन्ने का लाल सड़न भारत की सबसे विनाशकारी गन्ना बीमारी है। इस लेख में इसकी पहचान, प्रतिरोधी किस्में और वैज्ञानिक प्रबंधन का पूरा तरीका बताया गया है।
विषय-सूची
लाल सड़न रोग: गन्ने का कैंसर
गन्ने का लाल सड़न (Red Rot) रोग Colletotrichum falcatum नामक फफूंद से होता है और इसे 'गन्ने का कैंसर' कहा जाता है — क्योंकि एक बार खेत में आने पर यह पूरी किस्म को कुछ ही सालों में खत्म कर देता है। भारत की मशहूर किस्म Co 0238, जो 10 सालों तक 'चमत्कारी' मानी गई, इसी रोग की वजह से आज ज़्यादातर क्षेत्रों में बदली जा रही है।
यह रोग उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और तमिलनाडु — भारत के हर गन्ना क्षेत्र में है। संवेदनशील किस्मों में उपज हानि 30-50% और चीनी की मात्रा (sucrose) में 25% तक की कमी आती है।
रोग की भयावहता इसकी बीज-जनित प्रकृति से बढ़ती है — एक बार संक्रमित बीज (सेट्स) से बुवाई करने पर पूरी नई फसल संक्रमित हो जाती है। इसलिए बीज चयन और उपचार दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं।
पहचान — गन्ना काटकर देखने का तरीका
रोग की सबसे पक्की पहचान — संदिग्ध गन्ने को बीच से लंबाई में चीरकर (split) देखें। अंदर का गूदा लाल रंग में बदला हुआ मिलेगा, बीच-बीच में सफेद धब्बे (patches) होंगे, और गन्ने से शराब जैसी गंध (alcoholic smell) आएगी — यह लाल सड़न की निश्चित पहचान है।
बाहरी लक्षणों में — 3-4 महीने की फसल में तीसरी-चौथी पत्ती का पीला होकर सूखना, पूरे पौधे का मुरझाना, और तने पर छोटे लाल धब्बे दिखते हैं। गंभीर संक्रमण में गन्ना अंदर से खोखला हो जाता है और तेज़ हवा में टूट जाता है।
- गन्ना चीरने पर अंदर लाल रंग के साथ सफेद धब्बे
- गन्ने से शराब/सिरका जैसी गंध
- तीसरी-चौथी पत्ती का पीला होकर सूखना
- पूरे पौधे का मुरझाना
- तने पर छोटे लाल-भूरे धब्बे
अनुकूल परिस्थितियां और फैलाव
रोग 25-30°C तापमान, अधिक नमी और खराब जल निकासी वाले खेतों में सबसे अधिक फैलता है। जुलाई से सितंबर के बीच जब लगातार बारिश होती है, तब रोग सबसे तेज़ी से आगे बढ़ता है।
मुख्य फैलाव के तरीके — संक्रमित बीज सेट्स से (सबसे अधिक), खेत में पड़े संक्रमित अवशेषों से, सिंचाई के पानी से, और रोग-प्रभावित मिट्टी से। खेत में एक बार आने पर, फफूंद के बीजाणु मिट्टी में 8-12 महीने तक जीवित रहते हैं।
प्रतिरोधी किस्में — सबसे बड़ा हथियार
पिछले सालों में Co 0238 के प्रति फफूंद के नए स्ट्रेन विकसित हो गए हैं, इसलिए अब यह किस्म संवेदनशील मानी जाती है। इसके बदले CoLk 14201 (कल्याणी), Co 0118, Co 15023, CoPb 95, और CoS 13235 जैसी नई किस्में लगाना बेहतर है।
उत्तर भारत के लिए CoLk 14201, CoPb 95, Co 0118 उपयुक्त हैं। दक्षिण भारत के लिए Co 86032, CoM 0265 और CoV 09356 अच्छे विकल्प हैं। हमेशा अपने ज़ोन के लिए ICAR-IISR (लखनऊ) या क्षेत्रीय गन्ना अनुसंधान केंद्र से सिफारिश लें।
बीज उपचार और गर्म पानी विधि (MHAT)
गर्म पानी बीज उपचार (Moist Hot Air Treatment - MHAT) लाल सड़न की सबसे प्रभावी रोकथाम है। इसमें बीज सेट्स को 54°C तापमान पर 2.5 घंटे तक भाप में रखा जाता है। इससे अंदर की फफूंद मर जाती है और अंकुरण भी बेहतर होता है।
MHAT सुविधा न हो तो कार्बेन्डाजिम 50% WP @ 1 ग्राम/लीटर + थायोफेनेट मिथाइल 70% WP @ 1 ग्राम/लीटर के घोल में बीज सेट्स को 15 मिनट डुबाएं। इसके बाद Trichoderma viride @ 5 ग्राम/लीटर पानी में डुबाकर बुवाई करें।
- MHAT: 54°C पर 2.5 घंटे भाप उपचार
- कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम/लीटर + थायोफेनेट मिथाइल 1 ग्राम/लीटर — 15 मिनट डुबाएं
- Trichoderma viride 5 ग्राम/लीटर — जैविक बचाव
- स्वस्थ खेत से ही बीज लें (कभी संक्रमित नहीं)
- बीज गन्ना 8-10 महीने पुराना, स्वस्थ और मोटा हो
फसल चक्र और खेत प्रबंधन
एक बार रोग आने पर, कम से कम 2 साल के लिए उस खेत में गन्ना न लगाएं। इसकी जगह धान, गेहूं, दलहन (मूंग, अरहर) या हरी खाद (ढैंचा, सनई) की फसल लें। यह मिट्टी में फफूंद की संख्या को काफी कम कर देता है।
खेत में पानी न रुकने दें — अच्छी जल निकासी बनाएं। संक्रमित पौधों को जड़ सहित उखाड़कर जला दें, कभी भी कम्पोस्ट में न डालें। गन्ने की कटाई के बाद, खेत के पूरे अवशेष (trash) को हटा दें या जलाएं।
रासायनिक और जैविक नियंत्रण
खेत में रोग दिखते ही कार्बेन्डाजिम 50% WP @ 500 ग्राम + 500 लीटर पानी/एकड़ के हिसाब से पौधों की जड़ में डालें (soil drenching)। दूसरा उपचार 15 दिन बाद प्रोपिकोनाजोल 25% EC @ 1 मिली/लीटर पानी से करें।
जैविक नियंत्रण में Trichoderma harzianum को गोबर की खाद (5 किग्रा Trichoderma + 100 किग्रा खाद प्रति एकड़) में मिलाकर बुवाई से पहले खेत में डालें। यह मिट्टी में फफूंद की आबादी कम करता है और पौधे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
लेखक एवं समीक्षक
डॉ. सुमन पाटिल
वरिष्ठ पादप रोग विशेषज्ञ
Ph.D. पादप रोगविज्ञान (Plant Pathology), महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी
18+ वर्ष अनुभव पुणे, महाराष्ट्र
डॉ. पाटिल फसल रोग, कीट प्रबंधन और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पर 18 वर्षों से काम कर रही हैं। उन्होंने 40+ शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और महाराष्ट्र के KVK नेटवर्क में सक्रिय हैं।
यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 17 अक्टूबर 2025
स्रोत एवं संदर्भ
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — फसल उत्पादन तकनीक दिशानिर्देश ICAR, नई दिल्ली
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — योजना दस्तावेज़ भारत सरकार
- कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) — विस्तार सेवाएँ ICAR-ATARI
यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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