टमाटर की खेती

टमाटर की खेती और प्रमुख रोग प्रबंधन

टमाटर की वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान भाई अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। इस लेख में हम टमाटर की खेती के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत जानकारी देंगे।

डॉ. सुमन पाटिल प्रकाशित 25 मई 2026 11 मिनट का पठन अपडेट: 25 मई 2026

टमाटर की खेती: एक परिचय

टमाटर (सोलनम लाइकोपरसिकम) भारत की सबसे महत्वपूर्ण सब्जियों में से एक है। इसकी खेती पूरे देश में बड़े पैमाने पर की जाती है। टमाटर में विटामिन ए और सी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसे पोषण की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण बनाते हैं। इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए, टमाटर की वैज्ञानिक और आधुनिक तरीके से खेती करना किसानों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। यह नकदी फसल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक है।

टमाटर की खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु और मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन गर्म और आर्द्र जलवायु इसके लिए सबसे उपयुक्त होती है। अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी जिसका पीएच मान 6-7 के बीच हो, टमाटर की खेती के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। सही किस्म का चुनाव, उचित पोषण प्रबंधन और रोगों व कीटों का समय पर नियंत्रण टमाटर से अधिकतम पैदावार प्राप्त करने की कुंजी है। आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग का उपयोग करके किसान पानी और पोषक तत्वों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकते हैं।

टमाटर की उन्नत संकर किस्में

टमाटर की संकर किस्में अधिक उपज वाली, रोग प्रतिरोधी और बेहतर गुणवत्ता वाली होती हैं। किसानों को अपनी क्षेत्र की जलवायु और बाजार की मांग के अनुसार उपयुक्त किस्म का चुनाव करना चाहिए।

उत्तर और मध्य भारत के लिए कुछ लोकप्रिय और अत्यधिक अनुशंसित संकर किस्में इस प्रकार हैं:

1. अर्क रक्षक: यह किस्म बैक्टीरियल विल्ट, अर्ली ब्लाइट और लीफ कर्ल वायरस के प्रति प्रतिरोधी है। इसकी पैदावार 75-80 टन प्रति एकड़ तक हो सकती है। फल मध्यम आकार के, चमकदार लाल और अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। यह किस्म लंबी दूरी के परिवहन के लिए भी उपयुक्त है।

2. पूसा रूबी: यह एक पुरानी लेकिन विश्वसनीय किस्म है, जो अच्छी पैदावार देती है और प्रसंस्करण के लिए भी उपयुक्त है। फल मध्यम से बड़े आकार के और लाल होते हैं। इसकी औसत उपज 40-50 टन प्रति एकड़ है।

3. नवाचार 40 (सेमिनिस): यह किस्म उच्च उपज वाली है और फ्यूजेरियम विल्ट तथा वर्टिसिलियम विल्ट के प्रति सहिष्णु है। फल बड़े, अंडाकार और चमकदार होते हैं, जिनका वजन 90-100 ग्राम होता है। इसकी प्रति एकड़ पैदावार 60-70 टन तक हो सकती है।

4. अभिलाष (सेमिनिस): यह भी एक लोकप्रिय किस्म है जिसमें बैक्टीरियल विल्ट और अर्ली ब्लाइट के प्रति कुछ सहिष्णुता होती है। फल मध्यम आकार के, दृढ़ और अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। यह किस्म भी लंबी दूरी के परिवहन के लिए अनुकूल है।

5. हिमसोना (Advanta): यह पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अच्छी किस्म है और फ्यूजेरियम विल्ट के प्रति प्रतिरोधी है। इसके फल गोल, दृढ़ और आकर्षक लाल रंग के होते हैं।

इसके अलावा, कुछ अन्य अच्छी किस्में जैसे लक्ष्मी, टीएसआर-3, और अर्का सम्राट भी किसानों के बीच लोकप्रिय हैं। किस्म का चुनाव करते समय, स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से सलाह अवश्य लें।

नर्सरी तैयार करना और रोपण

टमाटर की सफल खेती के लिए स्वस्थ पौध तैयार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। नर्सरी में पौध तैयार करने से पौधों को शुरुआती अवस्था में बेहतर देखभाल मिलती है और कीटों व रोगों से बचाव होता है। नर्सरी के लिए अच्छी जल निकासी वाली, उपजाऊ और रोगमुक्त मिट्टी का चुनाव करें। बीजों को बुवाई से पहले कैप्टन या थायरम (2-3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित करना चाहिए ताकि बीज जनित रोगों से बचा जा सके।

नर्सरी बेड को 1 मीटर चौड़ा, 10-15 सेमी ऊंचा और आवश्यकतानुसार लंबा बनाएं। बुवाई से लगभग 15-20 दिन पहले, प्रति वर्ग मीटर में 2-3 किलोग्राम अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद मिलाएं। बीजों को कतारों में बोना चाहिए, जिनकी दूरी 10 सेमी हो और गहराई 0.5-1 सेमी हो। बुवाई के बाद, बीजों को हल्की मिट्टी या रेत से ढक दें और फव्वारे से हल्का पानी दें। नर्सरी को तेज धूप और भारी बारिश से बचाने के लिए शेड नेट का उपयोग करें।

पौधों का रोपण (Transplanting): जब पौध 20-25 दिन की या 15-20 सेमी ऊंची हो जाए और उन पर 4-5 सच्ची पत्तियां आ जाएं, तब उन्हें खेत में रोपित किया जा सकता है। रोपण शाम के समय करना चाहिए ताकि सूरज की गर्मी से पौधों को बचाया जा सके। रोपण से पहले नर्सरी में हल्का पानी दें ताकि पौध को आसानी से निकाला जा सके। खेत में रोपण के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75-90 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 45-60 सेमी रखें। प्रति एकड़ 8000-10000 पौधों की आवश्यकता होती है। रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें। पौधों को सहारा देने के लिए स्टैकिंग (Staking) या खूंटी लगाना आवश्यक है, खासकर संकर किस्मों में। इसके लिए बांस या लकड़ी के डंडों का उपयोग करें और पौधों को बढ़ते समय उनसे बांधते रहें।

सिंचाई और पोषण प्रबंधन (फर्टिगेशन)

टमाटर की फसल में उचित सिंचाई और संतुलित पोषण प्रबंधन उपज और गुणवत्ता दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। टमाटर को अपनी वृद्धि और फल उत्पादन के लिए नियमित रूप से पानी की आवश्यकता होती है। पानी की कमी से फूल झड़ने और फल फटने की समस्या हो सकती है।

ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) टमाटर की खेती के लिए सबसे कुशल सिंचाई प्रणाली है। यह पानी की बचत करती है (लगभग 40-50%), खरपतवारों को नियंत्रित करती है, और सीधे पौधों की जड़ों में पानी और पोषक तत्व पहुंचाती है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली के साथ फर्टिगेशन (Fertigation) यानी घुलनशील उर्वरकों को पानी के साथ देने से पोषक तत्वों का उपयोग और भी कुशल हो जाता है।

सामान्य तौर पर, टमाटर को फसल चक्र के दौरान 80-120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस और 100-120 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है। बुवाई के समय आधी फास्फोरस और एक तिहाई नाइट्रोजन व पोटाश डालें। बाकी बचे उर्वरकों को ड्रिप के माध्यम से फसल की विभिन्न अवस्थाओं में (वनस्पति वृद्धि, फूल आने और फल लगने के stages में) देना चाहिए। इसके लिए यूरिया, मोनो अमोनियम फास्फेट (MAP), मल्टी के (MKP) जैसे घुलनशील उर्वरकों का उपयोग करें। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए उपयुक्त सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण का छिड़काव या ड्रिप द्वारा उपयोग करें। हर 10-15 दिनों में मिट्टी की जांच कराकर पोषण प्रबंधन को अनुकूलित किया जा सकता है।

टमाटर के प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन

टमाटर की फसल में लगने वाले रोग पैदावार को substantially कम कर सकते हैं। समय पर पहचान और उचित प्रबंधन से इन रोगों को नियंत्रित किया जा सकता है।

1. लीफ कर्ल वायरस (Leaf Curl Virus): यह एक वायरल रोग है जो सफेद मक्खी (Whitefly) द्वारा फैलता है। प्रभावित पौधों की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं, छोटी हो जाती हैं और पीली पड़ जाती हैं। पौधों की वृद्धि रुक जाती है और फल बहुत कम या विकृत बनते हैं।

नियंत्रण: इस रोग का कोई सीधा उपचार नहीं है। मुख्य फोकस सफेद मक्खी के नियंत्रण पर होना चाहिए। इसके लिए नीम का तेल (3-5 मिली/लीटर पानी) या इमिडाक्लोप्रिड (0.5 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव करें। रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। ग्रसित पौधों को तुरंत हटाकर नष्ट कर दें।

2. अगेती झुलसा (Early Blight): यह एक फंगल रोग है जो अल्टरनेरिया सोलानी (Alternaria solani) नामक कवक के कारण होता है। पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जिनमें concentric ring (लक्ष्य के छल्ले) दिखाई देते हैं। गंभीर संक्रमण में पत्तियां पीली पड़कर गिर जाती हैं।

नियंत्रण: रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। खेत में साफ-सफाई रखें। मैनकोजेब (Mancozeb) @ 2.5 ग्राम/लीटर या क्लोरोथालोनिल (Chlorothalonil) @ 2 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर करें।

3. पछेती झुलसा (Late Blight): फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टन्स (Phytophthora infestans) नामक कवक से होता है। नम और ठंडे मौसम में तेजी से फैलता है। पत्तियों पर अनियमित आकार के गीले-गीले भूरे-काले धब्बे बनते हैं, जो तेजी से फैलते हैं और पूरी पत्ती को नष्ट कर देते हैं। फलों पर भी भूरे धब्बे दिखाई देते हैं।

नियंत्रण: रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। मैनकोजेब (Mancozeb) @ 2.5 ग्राम/लीटर या प्रोपीनेब (Propineb) @ 3 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव 7-10 दिन के अंतराल पर करें।

4. बैक्टीरियल विल्ट (Bacterial Wilt): यह रोग मिट्टी में रहने वाले बैक्टीरिया राल्सटोनिया सोलेनेसीरम (Ralstonia solanacearum) के कारण होता है। प्रभावित पौधे अचानक मुरझा जाते हैं और मर जाते हैं, हालांकि पत्तियां हरी बनी रहती हैं। तने को काटने पर भूरा स्राव (oozing) दिखाई देता है।

नियंत्रण: इस रोग का कोई प्रभावी रासायनिक उपचार नहीं है। रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। फसल चक्र अपनाएं। मिट्टी को सौर ऊर्जा से उपचारित करें। खेत से संक्रमित पौधों को हटाकर नष्ट कर दें।

टमाटर के प्रमुख कीट एवं उनका नियंत्रण

टमाटर की फसल को कई कीट भी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे उपज और गुणवत्ता प्रभावित होती है। समय पर कीटों की पहचान और नियंत्रण आवश्यक है।

1. फल छेदक (Fruit Borer / Hellicoverpa armigera): यह टमाटर का सबसे विनाशकारी कीट है। इसकी सूंडियां फलों में छेद करके अंदर घुस जाती हैं और गूदे को खाती हैं, जिससे फसल को भारी नुकसान होता है। प्रभावित फल बेचना मुश्किल हो जाते हैं।

नियंत्रण: फेरोमोन ट्रैप (5-7 ट्रैप प्रति एकड़) का उपयोग करें ताकि नर पतंगों को आकर्षित करके नष्ट किया जा सके। जैविक नियंत्रण के लिए ट्राइकोग्रामा चिलोनिस (Trichogramma chilonis) के अंडे प्रति एकड़ 50,000 की दर से छोड़ें। नीम का तेल (5 मिली/लीटर) या क्लोरेंट्रानिलिप्रोल (Chlorantraniliprole) @ 0.3 मिली/लीटर या इमामेक्टिन बेंजोएट (Emamectin Benzoate) @ 0.5 ग्राम/लीटर पानी का छिड़काव करें।

2. सफेद मक्खी (Whitefly / Bemisia tabaci): यह एक छोटा सफेद उड़ने वाला कीट है जो पत्तियों की निचली सतह पर रहता है और रस चूसता है। यह लीफ कर्ल वायरस का वेक्टर भी है। गंभीर संक्रमण में पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और मुड़ जाती हैं।

नियंत्रण: पीले चिपचिपे जाल (Yellow Sticky Traps) का उपयोग (20-25 ट्रैप प्रति एकड़) करें। नीम का तेल (3-5 मिली/लीटर) या इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) @ 0.5 मिली/लीटर पानी का छिड़काव करें।

3. माहु या एफिड (Aphids): यह छोटे, मुलायम शरीर वाले कीट होते हैं जो पत्तियों और तनों से रस चूसते हैं। ये हनीड्यू छोड़ते हैं जिस पर काली फफूंदी उग आती है, जिससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है।

नियंत्रण: नीम का तेल या इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव करें। प्राकृतिक शत्रु जैसे लेडीबग बीटल (Ladybug Beetle) भी इन्हें नियंत्रित करते हैं।

4. मकड़ी (Mites): ये छोटे कीट होते हैं जो पत्तियों की निचली सतह पर जाले बनाते हैं और रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और बाद में भूरी होकर गिर जाती हैं।

नियंत्रण: सल्फर (Wettable Sulphur) @ 2 ग्राम/लीटर या फेनप्रोपैथ्रिन (Fenpropathrin) @ 0.75 मिली/लीटर पानी का छिड़काव करें।

फलों की तुड़ाई और कटाई उपरांत प्रबंधन

टमाटर की तुड़ाई का सही समय बाजार की मांग और परिवहन की दूरी पर निर्भर करता है। लंबी दूरी के बाजारों के लिए, फलों को हरे-लाल (Breaker Stage) या हल्के गुलाबी अवस्था में तोड़ना चाहिए ताकि वे परिवहन के दौरान खराब न हों और बाजार तक पहुंचने तक पक जाएं। स्थानीय बाजारों के लिए, फलों को पूरी तरह से लाल और पके हुए अवस्था में तोड़ा जा सकता है।

तुड़ाई हर 3-4 दिन के अंतराल पर की जानी चाहिए क्योंकि फल एक साथ नहीं पकते। सुबह के ठंडे समय में तुड़ाई करना सबसे अच्छा होता है। फलों को पौधे से सावधानीपूर्वक तोड़ें ताकि उन्हें कोई यांत्रिक क्षति न हो। क्षतिग्रस्त फल जल्दी खराब हो जाते हैं। तुड़ाई के बाद, फलों को छांटना (Sorting) आवश्यक है। क्षतिग्रस्त, रोगग्रस्त, विकृत या छोटे फलों को अलग कर देना चाहिए। गुणवत्ता के आधार पर फलों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

पैकिंग (Packing): लंबी दूरी के परिवहन के लिए फलों को मजबूत प्लास्टिक क्रेट (लगभग 20-25 किलो क्षमता) या कार्डबोर्ड बक्से में पैक करना चाहिए। पैकिंग मैटेरियल जैसे पुआल या अखबारी कागज का उपयोग करके फलों को रगड़ और चोट से बचाया जा सकता है। उचित हवादार बक्से का उपयोग करें। फलों को पैक करते समय उन्हें कसकर न भरें। परिवहन के दौरान फलों को अत्यधिक गर्मी और सीधी धूप से बचाना चाहिए। शीत भंडारण (Cold Storage) में 12-14 डिग्री सेल्सियस तापमान और 85-90% सापेक्ष आर्द्रता पर टमाटर को 2-3 सप्ताह तक स्टोर किया जा सकता है, जिससे बाजार में मूल्य मिलने तक उन्हें सुरक्षित रखा जा सके। सटीक कटाई और पैकिंग विधियों से किसान अपने टमाटर की शेल्फ लाइफ बढ़ा सकते हैं और बेहतर बाजार मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।

इसके अलावा, भारत सरकार की कुछ योजनाएं जैसे 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' (PMKSY) और 'राष्ट्रीय बागवानी मिशन' (NHM) हैं जो किसानों को ड्रिप सिंचाई और बागवानी फसलों की खेती के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। किसान इन योजनाओं का लाभ उठाकर अपनी खेती को आधुनिक बना सकते हैं। इन योजनाओं के तहत सब्सिडी दरों पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली और पॉलीहाउस उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे फसल की उत्पादकता बढ़ती है और जोखिम कम होता है। अधिक जानकारी के लिए, किसान अपने स्थानीय कृषि विभाग या उद्यानिकी विभाग से संपर्क कर सकते हैं।

टमाटर की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें

टमाटर की खेती में कुछ और बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है जिससे आपको अच्छी उपज मिल सकती है।

1. मल्चिंग (Mulching): प्लास्टिक मल्च का उपयोग करने से खरपतवार नियंत्रण होता है, मिट्टी की नमी बनी रहती है, और मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है। इससे पानी की बचत होती है और फसल को कीटों व रोगों से बचाने में भी मदद मिलती है।

2. स्टैकिंग/सहारा देना (Staking): टमाटर के पौधों को सहारा देना बहुत जरूरी है, खासकर संकर किस्मों को। इससे फल मिट्टी के संपर्क में नहीं आते, जिससे रोगों और सड़न का खतरा कम होता है। साथ ही फलों की गुणवत्ता और आकार भी बेहतर होता है। बांस या लोहे के डंडों का उपयोग करके पौधों को बांधा जा सकता है।

3. फसल चक्र (Crop Rotation): एक ही खेत में लगातार टमाटर की फसल न लगाएं। फसल चक्र अपनाने से मिट्टी जनित रोगों और कीटों से बचाव होता है। टमाटर के बाद दलहनी फसलें जैसे मूंग या उड़द लगाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।

4. जैविक खाद का उपयोग: रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ गोबर की खाद, केंचुआ खाद और नीम खली का उपयोग करने से मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं। यह टिकाऊ खेती के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

इन सभी बातों का ध्यान रखकर और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर किसान भाई टमाटर की खेती से अधिकतम लाभ कमा सकते हैं।

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लेखक एवं समीक्षक

सुप

डॉ. सुमन पाटिल

वरिष्ठ पादप रोग विशेषज्ञ

Ph.D. पादप रोगविज्ञान (Plant Pathology), महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी

18+ वर्ष अनुभव पुणे, महाराष्ट्र

डॉ. पाटिल फसल रोग, कीट प्रबंधन और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पर 18 वर्षों से काम कर रही हैं। उन्होंने 40+ शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और महाराष्ट्र के KVK नेटवर्क में सक्रिय हैं।

यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 25 मई 2026

स्रोत एवं संदर्भ

  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — फसल उत्पादन तकनीक दिशानिर्देश ICAR, नई दिल्ली
  2. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — योजना दस्तावेज़ भारत सरकार
  3. कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) — विस्तार सेवाएँ ICAR-ATARI

यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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