धान की खेती

धान का झुलसा रोग (Blast) — लक्षण, बचाव और दवा

धान का झुलसा रोग एक गंभीर समस्या है जो फसल को बर्बाद कर सकती है। इस लेख में इसके लक्षण, रोकथाम और उपचार के बारे में जानें।

डॉ. सुमन पाटिल प्रकाशित 22 मार्च 2026 11 मिनट का पठन अपडेट: 22 मार्च 2026

परिचय: धान का झुलसा रोग – एक गंभीर खतरा

धान, भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जो करोड़ों लोगों के लिए आजीविका का साधन है। किंतु, धान की खेती में कई चुनौतियाँ आती हैं, जिनमें से एक प्रमुख चुनौती है धान का झुलसा रोग (Rice Blast Disease)। इसे ब्लास्ट रोग या पर्णीय झुलसा भी कहा जाता है। यह रोग पाईरीकुलारिया ओराइज़ी (Pyricularia oryzae) नामक फफूंद के कारण होता है। यह फफूंद धान के पौधे के विभिन्न भागों, जैसे पत्तियों, तनों, गांठों और बालियों को संक्रमित कर सकता है, जिससे भारी उपज हानि होती है, जो 70-80% तक पहुँच सकती है यदि सही समय पर नियंत्रण न किया जाए।

भारत में धान की खेती वाले लगभग सभी क्षेत्रों में यह रोग पाया जाता है, खासकर गर्म और नम मौसम में इसकी गंभीरता बढ़ जाती है। इसका प्रकोप केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में धान उगाने वाले देशों में एक प्रमुख समस्या है। किसान भाइयों को इस रोग के लक्षणों की सही पहचान, इसके कारणों को समझना और प्रभावी रोकथाम व नियंत्रण उपायों को अपनाना बेहद ज़रूरी है ताकि वे अपनी मेहनत की कमाई को बचा सकें और अच्छी उपज प्राप्त कर सकें। इस लेख में हम झुलसा रोग के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

धान के झुलसा रोग के लक्षण: पहचान है बचाव की कुंजी

झुलसा रोग के लक्षण पौधे के विभिन्न चरणों में और विभिन्न भागों पर दिखाई देते हैं। इनकी सही पहचान करके ही समय पर उपचार संभव है।

रोग के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • पत्तियों पर लक्षण (पर्ण झुलसा): पत्तियों पर नीले-हरे, अंडाकार या आंख के आकार के धब्बे दिखाई देते हैं, जिनके किनारे गहरे भूरे और बीच का हिस्सा राख जैसा या भूरा होता है। ये धब्बे धीरे-धीरे बड़े होकर आपस में मिल जाते हैं, जिससे पूरी पत्ती सूख जाती है और झुलसी हुई दिखाई देती है।
  • गांठों पर लक्षण (गांठ झुलसा): तने की गांठों पर भूरे या काले रंग के धब्बे बन जाते हैं। संक्रमित गांठें कमजोर होकर टूट जाती हैं, जिससे बालियां अधूरी या खाली रह जाती हैं। यह अवस्था सबसे हानिकारक होती है।
  • गर्दन पर लक्षण (गर्दन झुलसा/निचली गांठ का झुलसा): बालियां निकलने के समय बालियों के निचले भाग (गर्दन) पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं। इससे बालियां सही से नहीं भर पातीं और सफेद या अधभरी रह जाती हैं। कभी-कभी गर्दन पूरी तरह से सड़ जाती है और टूट जाती है।
  • बालियों पर लक्षण (बाली झुलसा): बालियों पर भी छोटे भूरे धब्बे दिखाई दे सकते हैं, जिससे दाने सिकुड़ जाते हैं या खाली रह जाते हैं।
  • बीज अंकुरण पर लक्षण: कभी-कभी यह रोग संक्रमित बीज से भी फैलता है, जिससे अंकुरण के बाद छोटे पौधों में ही रोग के लक्षण दिखने लगते हैं और वे मर जाते हैं।

धान झुलसा रोग के कारण और अनुकूल परिस्थितियाँ

धान का झुलसा रोग पाइरिकुलारिया ओराइज़ी (Pyricularia oryzae) नामक फफूंद के कारण होता है। यह फफूंद बीजों, फसल अवशेषों और खरपतवारों पर जीवित रह सकता है, जिससे अगले सीजन में संक्रमण का स्रोत बना रहता है।

इस रोग के फैलने और गंभीर होने के लिए कुछ विशेष वातावरणीय परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं:

  • उच्च आर्द्रता: 90% से अधिक सापेक्ष आर्द्रता रोग के विकास के लिए आदर्श होती है।
  • मध्यम तापमान: 22-28 डिग्री सेल्सियस का तापमान फफूंद के लिए अनुकूल होता है। रात का तापमान कम (20-22 डिग्री सेल्सियस) और दिन का तापमान अधिक होने पर रोग तेजी से फैलता है।
  • लंबे समय तक पत्तियों पर नमी: ओस या हल्की बारिश के कारण पत्तियों पर लंबे समय तक नमी रहने से फफूंद के बीजाणु अंकुरित होते हैं।
  • नाइट्रोजन का अधिक उपयोग: धान में अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक के प्रयोग से पत्तियां नरम और रोग के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
  • सुगराही किस्में: झुलसा रोग के प्रति संवेदनशील किस्मों की बुवाई करने पर रोग का प्रकोप अधिक होता है।
  • खरपतवार: संक्रमित खरपतवार भी रोग के विस्तार में सहायक होते हैं।

धान झुलसा रोग से होने वाले नुकसान

धान का झुलसा रोग फसल को कई तरह से नुकसान पहुँचाता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। यह रोग न केवल उपज की मात्रा को कम करता है, बल्कि गुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।

मुख्य नुकसान इस प्रकार हैं:

  • उपज में कमी: यह सबसे प्रमुख नुकसान है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में उपज में 50-80% तक की कमी आ सकती है, खासकर यदि गर्दन या बाली झुलसा का प्रकोप हो।
  • दाने की गुणवत्ता में गिरावट: संक्रमित बालियों में दाने सिकुड़ जाते हैं, हल्के हो जाते हैं और उनकी बाजार कीमत कम हो जाती है।
  • अंकुरण क्षमता में कमी: यदि संक्रमित बीजों का उपयोग किया जाता है, तो अंकुरण प्रतिशत घट जाता है, जिससे पौध की संख्या कम हो जाती है।
  • पत्ती क्षेत्र का नुकसान: पत्तियों पर धब्बे बनने से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती है, जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है।
  • खर्च में वृद्धि: रोग के नियंत्रण के लिए कीटनाशकों और अन्य प्रबंधन उपायों पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।

धान में झुलसा रोग का एकीकृत प्रबंधन: बचाव के चरण-दर-चरण तरीके

झुलसा रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए एकीकृत फसल प्रबंधन (Integrated Pest Management - IPM) दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसमें विभिन्न गैर-रासायनिक और रासायनिक तरीकों का संयोजन शामिल है।

निम्नलिखित चरण-दर-चरण विधि अपनाई जा सकती है:

  • रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव: झुलसा रोग प्रतिरोधी या सहिष्णु किस्मों (जैसे पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509 आदि) का चुनाव करें। अपने क्षेत्र के कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से संपर्क कर उपयुक्त किस्मों की जानकारी लें।
  • स्वच्छ बीज का उपयोग और बीज उपचार: हमेशा प्रमाणित और स्वस्थ बीज का ही प्रयोग करें। बुवाई से पूर्व बीजों को कार्बोक्सिन (37.5%) + थायरम (37.5%) डब्ल्यूएस @ 2 ग्राम/किलोग्राम या ट्राईसाइक्लाज़ोल (Triazolone) 75% WP @ 2 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। इससे प्रारंभिक संक्रमण को रोकने में मदद मिलती है।
  • सही समय पर बुवाई: अत्यधिक देर से या बहुत जल्दी बुवाई से बचें, क्योंकि यह रोग के प्रकोप को बढ़ा सकता है। सही समय पर बुवाई से फसल को रोग से बचने का अवसर मिलता है।
  • उचित पोषण प्रबंधन: नाइट्रोजन उर्वरक का संतुलित उपयोग करें। अत्यधिक नाइट्रोजन पत्तियों को मुलायम बनाकर रोग के प्रति संवेदनशील बनाता है। फास्फोरस और पोटाश का उचित प्रयोग करें, क्योंकि ये पौधे को रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। नाइट्रोजन को हमेशा विभाजित खुराक में दें।
  • जल प्रबंधन: खेतों में पानी की उचित निकासी सुनिश्चित करें, क्योंकि लगातार अधिक नमी रोग के लिए अनुकूल होती है। खेत को बहुत शुष्क या बहुत पानी से भरा न रखें।
  • खरपतवार नियंत्रण: खेतों और मेड़ों पर उगने वाले खरपतवारों को नियमित रूप से निकालें, क्योंकि ये फफूंद के लिए वैकल्पिक मेजबान का काम कर सकते हैं।
  • फसल अवशेष प्रबंधन: फसल काटने के बाद धान के अवशेषों को खेत से हटा दें या जला दें, क्योंकि ये फफूंद के बीजाणुओं को छिपाने का स्थान प्रदान करते हैं। गहरी जुताई से भी अवशेषों को मिट्टी में दबाया जा सकता है।

धान के झुलसा रोग की रोकथाम के लिए रासायनिक उपाय और दवाएं

जब रोग का प्रकोप बढ़ जाए और गैर-रासायनिक उपाय पर्याप्त न हों, तो फफूंदनाशक दवाओं का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। सही दवा का चुनाव और उसका उचित समय पर प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

निम्नलिखित कुछ प्रभावी रासायनिक उपाय और दवाएं हैं:

  • बीज उपचार के लिए: बुवाई से पहले बीजों को ट्राईसाइक्लाज़ोल (Triazole) 75% WP @ 2-3 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से या थीरम (Thiram) 75% WS @ 2-2.5 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
  • पर्ण झुलसा और गांठ झुलसा के लिए: प्रारंभिक लक्षण दिखने पर निम्नलिखित में से किसी एक फफूंदनाशक का छिड़काव करें: <ul> <li>ट्राईसाइक्लाज़ोल (Tricyclazole) 75% WP @ 125 ग्राम/एकड़</li> <li>एज़ोक्सिस्ट्रोबिन (Azoxystrobin) 23% SC @ 200 मिलीलीटर/एकड़</li> <li>कार्बेन्डाजिम (Carbendazim) 50% WP @ 200 ग्राम/एकड़</li> <li>आईसोप्रोथिओलेन (Isoprothiolane) 40% EC @ 400 मिलीलीटर/एकड़</li> <li>थियोफनेट मिथाइल (Thiophanate Methyl) 70% WP @ 280 ग्राम/एकड़</li> </ul>
  • गर्दन झुलसा के लिए: बालियां निकलने के समय गर्दन झुलसा के लक्षण दिखने पर या रोकथाम के लिए, निम्नलिखित में से किसी एक शक्तिशाली फफूंदनाशक का छिड़काव करें: <ul> <li>ट्राईसाइक्लाज़ोल (Tricyclazole) 75% WP @ 150-180 ग्राम/एकड़</li> <li>एज़ोक्सिस्ट्रोबिन (Azoxystrobin) 23% SC @ 200 मिलीलीटर/एकड़ (पुनः छिड़काव 10-15 दिन बाद)</li> <li>पायरॉकलोस्ट्रोबिन (Pyraclostrobin) 20% WG @ 100-120 ग्राम/एकड़</li> <li>मिक्स फफूंदनाशक जैसे ट्राईफ्लोक्सीस्ट्रोबिन (Trifloxystrobin) 10% + टेबुकोनाजोल (Tebuconazole) 12.5% SC @ 160 मिलीलीटर/एकड़</li> </ul>
  • छिड़काव का समय: रोग के पहले लक्षण दिखते ही तत्काल छिड़काव करें और यदि आवश्यक हो तो 10-15 दिनों के अंतराल पर दूसरा छिड़काव करें। विशेष रूप से जब बालियां निकल रही हों (boot leaf stage) और फूल आने से पहले की अवस्था (panicle initiation stage) पर सतर्क रहें। हमेशा अनुशंसित मात्रा और सही तकनीक से छिड़काव करें।

धान झुलसा रोग: सामान्य गलतियाँ और उनसे कैसे बचें

झुलसा रोग के प्रबंधन में अक्सर कुछ गलतियाँ हो जाती हैं, जिससे रोग का नियंत्रण कठिन हो जाता है और फसल को भारी नुकसान होता है। इन गलतियों को समझना और उनसे बचना बहुत ज़रूरी है।

सामान्य गलतियाँ और बचने के तरीके:

  • रोग की गलत पहचान: अक्सर किसान झुलसा रोग को अन्य पत्ती धब्बे वाले रोगों से भ्रमित कर देते हैं, जिससे गलत दवा का प्रयोग होता है। बचाव: कृषि विशेषज्ञों या कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से संपर्क कर सही पहचान करवाएं। लक्षणों को ध्यान से देखें।
  • देर से उपचार: रोग के लक्षण दिखने के काफी समय बाद उपचार शुरू करना। बचाव: जैसे ही पहले लक्षण दिखें, तत्काल रासायनिक या जैविक उपचार शुरू करें। रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर है।
  • गलत फफूंदनाशक का प्रयोग: बीमारी के लिए अनुपयुक्त या अप्रभावी फफूंदनाशक का उपयोग करना। बचाव: केवल अनुशंसित और प्रमाणित फफूंदनाशकों का ही प्रयोग करें। कृषि विशेषज्ञ की सलाह लें।
  • फफूंदनाशक की गलत खुराक: अनुशंसित खुराक से कम या ज्यादा दवा का उपयोग करना। बचाव: हमेशा लेबल पर दिए गए निर्देशों और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार सही खुराक का प्रयोग करें। कम खुराक अप्रभावी हो सकती है और अधिक मात्रा फसल को नुकसान पहुंचा सकती है।
  • असंतुलित पोषण प्रबंधन: विशेषकर नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग, जो पौधे को रोग के प्रति संवेदनशील बनाता है। बचाव: मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें और नाइट्रोजन को विभाजित खुराक में दें।

झुलसा रोग प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ सुझाव

झुलसा रोग एक जटिल समस्या है, जिसके प्रभावी प्रबंधन के लिए विशेषज्ञों की सलाह और नवीनतम कृषि तकनीकों का पालन करना महत्वपूर्ण है।

कुछ विशेषज्ञ सुझाव इस प्रकार हैं:

  • क्षेत्रीय जलवायु के अनुसार किस्मों का चुनाव: अपने क्षेत्र की जलवायु और झुलसा रोग के प्रकोप की संभावना को देखते हुए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें। स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों से परामर्श लें।
  • निगरानी और समय पर कार्रवाई: फसल की नियमित निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हर दूसरे दिन खेत का दौरा करें और पत्तियों, तनों व बालियों पर झुलसा के लक्षणों की तलाश करें। जैसे ही पहले लक्षण दिखें, तुरंत उपयुक्त कार्रवाई करें।
  • जैविक नियंत्रण: रासायनिक दवाओं के साथ-साथ जैविक फफूंदनाशकों (जैसे ट्राइकोडर्मा विरिडे) का प्रयोग भी किया जा सकता है, विशेषकर रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों के निपटान में। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को भी सुधारता है।
  • रोपण घनत्व का प्रबंधन: पौधों की बहुत अधिक घनी रोपाई से बचें, क्योंकि इससे खेत में हवा का संचार कम होता है और आर्द्रता बढ़ जाती है, जिससे रोग का फैलाव आसान हो जाता है। उचित दूरी पर रोपण करें।
  • वैज्ञानिक सलाह का पालन: किसी भी संदेह या गंभीर प्रकोप की स्थिति में, तत्काल कृषि वैज्ञानिक, कृषि विस्तार अधिकारी या संबंधित कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से संपर्क करें और उनकी सलाह का पालन करें।

सावधानियाँ: झुलसा रोग से निपटने में क्या करें और क्या न करें

झुलसा रोग का प्रबंधन करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतना आवश्यक है ताकि रोग का फैलाव रोका जा सके और फसल को सुरक्षित रखा जा सके।

  • क्या करें:
  • रोग प्रतिरोधी किस्में लगाएं।
  • प्रमाणित और उपचारित बीज का प्रयोग करें।
  • नाइट्रोजन का संतुलित और विभाजित प्रयोग करें।
  • खेत की नियमित रूप से निगरानी करें।
  • रोग के लक्षण दिखते ही तत्काल सही फफूंदनाशक का छिड़काव करें।
  • फसल अवशेषों को खेत से हटा दें या गहरी जुताई करें।
  • खरपतवारों का उचित नियंत्रण करें।
  • कृषि विशेषज्ञों की सलाह लें।
  • छिड़काव करते समय सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग करें।
  • क्या न करें:
  • रोगग्रस्त बीजों का उपयोग न करें।
  • नाइट्रोजन उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग न करें।
  • रोग के लक्षणों को नजरअंदाज न करें और उपचार में देरी न करें।
  • गलत या अप्रभावी दवाओं का प्रयोग न करें।
  • बिना सुरक्षा उपकरण के रसायनों का छिड़काव न करें।
  • खेतों में पानी का ठहराव न होने दें।
  • फसल अवशेषों को खेत में खुला न छोड़ें।

निष्कर्ष: समन्वित प्रयास, सुरक्षित फसल

धान का झुलसा रोग निस्संदेह धान की खेती के लिए एक बड़ी चुनौती है, जो किसानों की कड़ी मेहनत और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, एकीकृत फसल प्रबंधन (IPM) तकनीकों को अपनाकर, जिसमें रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव, स्वस्थ बीज का उपयोग, संतुलित पोषण प्रबंधन, स्वच्छ कृषि पद्धतियाँ और समय पर रासायनिक नियंत्रण शामिल है, इस रोग से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

किसान भाइयों को रोग के लक्षणों की सही पहचान करने, स्थानीय कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह लेने और सुझाए गए उपायों को ईमानदारी से लागू करने की आवश्यकता है। केवल समन्वित और जागरूक प्रयासों से ही हम अपनी धान की फसल को झुलसा रोग से सुरक्षित रख सकते हैं और एक भरपूर उपज प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है कि आपकी फसल इस हानिकारक शत्रु के सामने घुटने न टेके।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

धान के झुलसा रोग के प्रमुख लक्षण क्या हैं?

उत्तर: धान के झुलसा रोग के प्रमुख लक्षण पत्तियों पर नीले-हरे, आंख के आकार के धब्बे होते हैं, जिनके किनारे गहरे भूरे और बीच का हिस्सा राख जैसा होता है। तने की गांठों पर भूरे-काले धब्बे और बालियों के निचले भाग (गर्दन) पर भूरे-काले धब्बे दिखते हैं जिससे बालियां खाली रह जाती हैं।

झुलसा रोग किस कारण होता है?

उत्तर: यह रोग पाइरिकुलारिया ओराइज़ी (Pyricularia oryzae) नामक फफूंद के कारण होता है।

झुलसा रोग से बचाव के लिए कौन सी रासायनिक दवा सबसे प्रभावी है?

उत्तर: ट्राईसाइक्लाज़ोल (Tricyclazole) 75% WP, एज़ोक्सिस्ट्रोबिन (Azoxystrobin) 23% SC और पाय रॉकलोस्ट्रोबिन (Pyraclostrobin) 20% WG झुलसा रोग के लिए कुछ प्रभावी फफूंदनाशक हैं। सही दवा के चयन के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना महत्वपूर्ण है।

क्या धान का झुलसा रोग बीज जनित होता है?

उत्तर: हां, झुलसा रोग बीज जनित हो सकता है। संक्रमित बीजों से रोग अगले सीजन में फैल सकता है, इसलिए बीज उपचार बहुत महत्वपूर्ण है।

झुलसा रोग के प्रकोप को कम करने के लिए नाइट्रोजन उर्वरक का प्रबंधन कैसे करें?

उत्तर: नाइट्रोजन उर्वरक का संतुलित उपयोग करें और इसे विभाजित खुराकों में दें। अत्यधिक नाइट्रोजन पौधों को रोग के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। फास्फोरस और पोटाश का उचित प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

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लेखक एवं समीक्षक

सुप

डॉ. सुमन पाटिल

वरिष्ठ पादप रोग विशेषज्ञ

Ph.D. पादप रोगविज्ञान (Plant Pathology), महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी

18+ वर्ष अनुभव पुणे, महाराष्ट्र

डॉ. पाटिल फसल रोग, कीट प्रबंधन और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पर 18 वर्षों से काम कर रही हैं। उन्होंने 40+ शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और महाराष्ट्र के KVK नेटवर्क में सक्रिय हैं।

यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 22 मार्च 2026

स्रोत एवं संदर्भ

  1. धान में झुलसा रोग: पहचान, कारण व नियंत्रण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
  2. Rice Blast Disease Management कृषि मंत्रालय, भारत सरकार
  3. पौधा संरक्षण चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार
  4. धान की फसल में रोग एवं कीट प्रबंधन इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़
  5. धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन उत्तर प्रदेश कृषि विभाग

यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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