धान की खेती

धान की खेती — रोपाई से कटाई तक पूरी जानकारी

यह लेख धान की नर्सरी तैयारी से लेकर कटाई तक की संपूर्ण जानकारी देता है, जिसमें बीज चयन, रोपण, सिंचाई, खाद प्रबंधन, रोग नियंत्रण और कटाई के बाद के कार्य शामिल हैं।

डॉ. अनिल कुमार वर्मा प्रकाशित 6 जून 2026 13 मिनट का पठन अपडेट: 6 जून 2026

धान की खेती का परिचय

भारत में धान मुख्य खाद्य फ़सल है और देश की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। धान की खेती से लाखों किसानों को रोज़गार मिलता है और यह ग्रामीण आजीविका का एक बड़ा आधार है। भारत विश्व में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। धान की खेती मुख्य रूप से खरीफ मौसम में की जाती है, जब मॉनसून का पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है। धान की खेती में सही जानकारी और वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके किसान भाई अपनी उपज को कई गुना बढ़ा सकते हैं। यह लेख आपको धान की नर्सरी तैयार करने से लेकर कटाई तक की विस्तृत जानकारी देगा, जिससे आप धान की खेती को अधिक लाभकारी बना सकें। हम इसमें उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी जानकारी शामिल करेंगे।

धान की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके लिए 20 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान और 100-200 सेमी वार्षिक वर्षा उपयुक्त मानी जाती है। हालांकि, आधुनिक तकनीकों और उन्नत किस्मों के कारण धान की खेती अब विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में भी सफलतापूर्वक की जा रही है। मिट्टी की बात करें तो, धान के लिए दोमट से लेकर बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। ऐसी मिट्टी में जल धारण क्षमता अच्छी होती है।

  • धान भारत की मुख्य खाद्य फ़सल है।
  • यह देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
  • गर्म और आर्द्र जलवायु धान के लिए उपयुक्त है।
  • दोमट से बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है।

धान की प्रमुख किस्में और उनका चुनाव

धान की सही किस्म का चुनाव आपकी उपज और आय को सीधे प्रभावित करता है। भारत में धान की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें बासमती, सोना मसूरी, आईआर-64 (IR-64) और पूसा-44 (Pusa-44) प्रमुख हैं। प्रत्येक किस्म की अपनी खासियत और अपनी पैदावार क्षमता होती है। बासमती धान अपनी सुगंध और लंबे, पतले दानों के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बहुत मांग है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान बासमती 1121, बासमती 1509 और पूसा बासमती 1718 जैसी किस्में उगाते हैं, जिनकी कटाई अवधि लगभग 115 से 140 दिन होती है। सोना मसूरी दक्षिण भारत की एक लोकप्रिय किस्म है, जो खाने में हल्की और स्वादिष्ट होती है। यह आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में अधिक उगाई जाती है। वहीं, आईआर-64 एक उच्च उपज देने वाली किस्म है जो विभिन्न जलवायु में आसानी से उग सकती है। पूसा-44 एक पुरानी लेकिन बेहद उच्च उपज वाली किस्म है, जिसे विशेष रूप से उत्तर भारत में उगाया जाता है। यह पकने में लगभग 160 दिन लेती है।

किस्म का चुनाव करते समय आपको अपनी ज़मीन की मिट्टी के प्रकार, उपलब्ध सिंचाई सुविधा, खेत की उर्वरता, स्थानीय जलवायु और बाज़ार की मांग को ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप निर्यात के लिए खेती कर रहे हैं, तो बासमती किस्में बेहतर विकल्प होंगी। यदि आपका उद्देश्य अधिक पैदावार है और कटाई के लिए लंबा समय है, तो पूसा-44 जैसी किस्में चुन सकते हैं। उन्नत बीज गुणवत्ता के लिए हमेशा प्रमाणित बीज ही खरीदें।

विभिन्न किस्मों की विशेषताएं:

  • बासमती: सुगंधित, लंबे दाने, अंतर्राष्ट्रीय मांग। अवधि: 115-140 दिन।
  • सोना मसूरी: हल्की, स्वादिष्ट, दक्षिण भारत में लोकप्रिय।
  • IR-64: उच्च उपज, बहुमुखी।
  • पूसा-44: बहुत उच्च उपज, उत्तर भारत में पुरानी लोकप्रिय किस्म। अवधि: 160 दिन।

नर्सरी की तैयारी और बीज उपचार

अच्छी नर्सरी ही अच्छी उपज की नींव होती है। धान की नर्सरी तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत का चुनाव करें। नर्सरी के लिए ऐसी जगह चुनें जहाँ पानी की अच्छी सुविधा हो और सीधी धूप आती हो। एक एकड़ खेत की रोपाई के लिए 20-25 वर्गमीटर जगह की नर्सरी पर्याप्त होती है। बीज उपचार बहुत महत्वपूर्ण है। बुआई से पहले बीजों को फफूंदनाशक जैसे कॉर्बेन्डाजिम (Carbendazim) (2 ग्राम प्रति किलो बीज) या थायरम (Thiram) (2.5 ग्राम प्रति किलो बीज) से उपचारित करें। इससे अंकुरण अच्छा होता है और शुरुआती दौर में पौधों को रोगों से बचाया जा सकता है। बीज को 24 घंटे पानी में भिगोकर रखें और फिर 24 घंटे नम बोरियों में रखें ताकि उनमें अंकुरण होने लगे। नर्सरी खेत की तैयारी के लिए ज़मीन की दो-तीन बार जुताई करें और मिट्टी को भुरभुरा बना लें। फिर क्यारियाँ बना लें। प्रति वर्ग मीटर 50-70 ग्राम बीज समान रूप से फैलाएँ। बुआई के बाद हल्की मिट्टी से ढक दें और पानी दें। नर्सरी में पानी का उचित प्रबंधन करें और खरपतवारों को नियमित रूप से निकालते रहें। 20-25 दिन में पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं।

  • नर्सरी के लिए 20-25 वर्गमीटर प्रति एकड़ पर्याप्त है।
  • बीज उपचार फफूंदनाशक से करें (जैसे कॉर्बेन्डाजिम 2 ग्राम/किलो)।
  • बीज को 24 घंटे पानी में भिगोएँ, फिर 24 घंटे नम बोरी में रखें।
  • मिट्टी को भुरभुरा बनाकर क्यारियाँ बनाएँ।
  • 20-25 दिन में पौधे रोपाई के लिए तैयार।

धान की रोपाई: सही तरीका और समय

धान की रोपाई का सही समय और तरीका उपज को बहुत प्रभावित करता है। उत्तर भारत में जुलाई के पहले सप्ताह से जुलाई के अंतिम सप्ताह तक रोपाई की जाती है। हालांकि, बासमती धान की कुछ किस्मों की रोपाई अगस्त के पहले सप्ताह तक भी हो सकती है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूसा 44 की रोपाई अक्सर जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक की जाती है ताकि उसे पकने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। पौधों को नर्सरी से निकालते समय सावधानी बरतें ताकि जड़ों को नुकसान न पहुँचे। प्रति गुच्छे में 2-3 पौधे लगाएँ। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखें। यह घनी रोपाई नहीं होनी चाहिए जिससे पौधों को पर्याप्त हवा और धूप मिल सके। यदि आप एसआरआई (SRI) विधि का उपयोग कर रहे हैं, तो एक जगह पर एक ही पौधा लगाएँ और दूरी 25 सेमीx25 सेमी रखें। रोपाई के बाद तुरंत हल्का पानी दें।

रोपाई का सर्वोत्तम समय दोपहर बाद या शाम का होता है, जब धूप कम होती है। इससे पौधों को नई जगह पर स्थापित होने का ज़्यादा मौका मिलता है। रोपाई के दौरान खेत में 2-3 सेमी पानी बनाए रखें। कुछ किसान रोपाई से पहले खेत में बेसल डोज़ के रूप में खाद डालते हैं, जो बाद में चर्चा की जाएगी।

सही रोपाई तकनीक और समय फसल के स्वस्थ विकास और अच्छी उपज के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  • उत्तर भारत में जुलाई के पहले सप्ताह से अंतिम सप्ताह तक रोपाई।
  • बासमती की रोपाई अगस्त के पहले सप्ताह तक।
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेमी, पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी।
  • SRI विधि में 25 सेमीx25 सेमी दूरी पर एक पौधा लगाएँ।
  • दोपहर बाद या शाम को रोपाई करें।

सिंचाई प्रबंधन: जल संरक्षण और SRI विधि

धान की खेती में पानी का सही प्रबंधन बहुत ज़रूरी है। धान को आमतौर पर अधिक पानी की ज़रूरत होती है, लेकिन पानी का दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। रोपाई के शुरुआती चरणों में खेत में 2-3 सेमी पानी बनाए रखना महत्वपूर्ण है। पौधे के विकास के साथ पानी का स्तर बढ़ाया जा सकता है, लगभग 5-7 सेमी। दाना भरते समय और दूधिया अवस्था में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। कटाई से 10-15 दिन पहले खेत से पानी निकालना शुरू कर देना चाहिए ताकि कटाई आसान हो और दाने फटें नहीं। एसआरआई (SRI - System of Rice Intensification) विधि धान की खेती में जल संरक्षण का एक उत्कृष्ट तरीका है। इस विधि में कम पानी, कम बीज और कम खाद का उपयोग करके भी अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। एसआरआई में, धान के छोटे (10-15 दिन पुराने) और अकेले पौधे को चौड़ी दूरी पर (25x25 सेमी या 30x30 सेमी) रोपा जाता है। खेत को हमेशा गीला रखा जाता है, लेकिन उसमें पानी खड़ा नहीं रखा जाता। खरपतवारों को निकालने के लिए कोनो-वीडर का प्रयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी में हवा का संचार भी होता है।

एसआरआई विधि पारंपरिक तरीकों की तुलना में 30% तक पानी बचा सकती है और 15-20% तक अधिक उपज दे सकती है। यह किसानों के लिए एक बहुत ही लाभकारी तकनीक है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ पानी की कमी है। भारत सरकार भी विभिन्न योजनाओं जैसे ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के तहत किसानों को जल संरक्षण विधियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे न केवल पानी की बचत होती है बल्कि मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर होता है।

  • शुरुआती चरणों में 2-3 सेमी पानी, बाद में 5-7 सेमी।
  • कटाई से 10-15 दिन पहले पानी निकालें।
  • SRI विधि: कम पानी, कम बीज, अधिक उपज।
  • SRI में 10-15 दिन पुराने और अकेले पौधे को 25x25 सेमी पर रोपें।
  • SRI से 30% पानी की बचत और 15-20% अधिक उपज।

खाद और उर्वरक प्रबंधन

धान की अच्छी उपज के लिए संतुलित खाद और उर्वरक प्रबंधन बेहद ज़रूरी है। मिट्टी की जाँच के आधार पर खाद का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है, लेकिन सामान्यतः उत्तर भारतीय परिस्थितियों के लिए निम्नलिखित मात्रा अनुशंसित की जाती है। नाइट्रोजन (यूरिया), फास्फोरस (डीएपी) और पोटाश (एमओपी) तीनों ही ज़रूरी हैं। एक एकड़ खेत के लिए सामान्यतः 120-150 किलो यूरिया, 60 किलो डीएपी और 40 किलो एमओपी की आवश्यकता होती है। डीएपी (50-60 किलो प्रति एकड़) और पोटाश (40 किलो प्रति एकड़) की पूरी मात्रा रोपाई के समय या रोपाई से एक-दो दिन पहले खेत तैयार करते समय बेसल डोज़ के रूप में देनी चाहिए। यूरिया की मात्रा को तीन भागों में बाँट कर देना चाहिए: पहला भाग (40-50 किलो) रोपाई के 7-10 दिन बाद, दूसरा भाग (40-50 किलो) कल्ले फूटने के समय (रोपाई के 25-30 दिन बाद) और तीसरा भाग (40-50 किलो) फूल आने से पहले (रोपाई के 45-50 दिन बाद)। जस्ते की कमी (Zinc deficiency) धान में एक आम समस्या है, खासकर उन ज़मीनों में जहाँ पीएच (pH) मान ज़्यादा होता है। इसकी कमी को पूरा करने के लिए 10-15 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़ रोपाई से पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे लोहा (Iron) और मैंगनीज़ (Manganese) की भी आवश्यकता हो सकती है, जिसकी पूर्ति के लिए पर्णीय छिड़काव (foliar spray) किया जा सकता है। संतुलित पोषण से पौधे स्वस्थ रहते हैं और रोगों व कीटों का प्रकोप भी कम होता है।

  • 1 एकड़ के लिए: 120-150 किलो यूरिया, 60 किलो डीएपी, 40 किलो एमओपी।
  • डीएपी और पोटाश बेसल डोज़ में दें।
  • यूरिया को 3 भागों में दें: 7-10 दिन बाद, 25-30 दिन बाद, 45-50 दिन बाद।
  • जिंक की कमी के लिए 10-15 किलो जिंक सल्फेट प्रति एकड़।
  • सूक्ष्म पोषक तत्वों के लिए पर्णीय छिड़काव कर सकते हैं।

धान में लगने वाले प्रमुख रोग और कीट नियंत्रण

धान की फसल को कई रोग और कीट नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे उपज में भारी कमी आ सकती है। प्रमुख रोगों में ब्लास्ट (Blast) और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (Bacterial Leaf Blight - BLB) शामिल हैं। ब्लास्ट पत्तों, तनों और बाली पर हमला करता है, जिससे भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। इसके नियंत्रण के लिए ट्राईसाइक्लाज़ोल (Tricyclazole) (0.6 ग्राम प्रति लीटर पानी) या इप्रोबेनफ़ोस (Iprobefos) (1.5 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव किया जा सकता है। बीएलबी बैक्टीरिया जनित रोग है, जिसमें पत्तियाँ सिरे से पीली पड़ने लगती हैं। इसके लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट और टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड (Streptomycin Sulphate + Tetracycline Hydrochloride) (75 ग्राम प्रति हेक्टेयर) का घोल छिड़का जा सकता है, साथ ही पोटाश की मात्रा बढ़ाना भी फ़ायदेमंद होता है। कीटों में तना छेदक (Stem Borer) सबसे विनाशकारी कीट है। इसकी सूँड़ तने के अंदर घुसकर उसे खोखला कर देती है, जिससे पौधे सूख जाते हैं और बालियाँ सफेद हो जाती हैं (व्हाइट ईयर हेड)। इसके नियंत्रण के लिए शुरुआती अवस्था में नीम आधारित कीटनाशक या फिप्रोनिल (Fipronil) (0.3 जीआर - 7.5 किलो प्रति एकड़) या कारटेप हाइड्रोक्लोराइड (Cartap Hydrochloride) (4 जीआर - 10 किलो प्रति एकड़) जैसे दानेदार कीटनाशक का प्रयोग किया जा सकता है। इनके अलावा, पत्ता लपेटक (Leaf Folder), गंधी बग (Gandhi Bug) और सैनिक कीट (Army Worm) जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इन कीटों से बचाव के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management - IPM) अपनाना चाहिए, जिसमें जैविक नियंत्रण, फेरोमोन ट्रैप, खेत की नियमित निगरानी और ज़रूरत पड़ने पर ही रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग शामिल है। स्वस्थ बीज और उचित स्वच्छता भी रोग और कीटों से बचाव में मददगार होती है।

  • ब्लास्ट रोग के लिए ट्राईसाइक्लाज़ोल या इप्रोबेनफ़ोस का छिड़काव।
  • BLB के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन + टेट्रासाइक्लिन और पोटाश का उपयोग।
  • तना छेदक के लिए फिप्रोनिल या कारटेप हाइड्रोक्लोराइड दानेदार कीटनाशक।
  • IPM अपनाएँ: जैविक नियंत्रण, फेरोमोन ट्रैप, निगरानी।
  • स्वस्थ बीज और खेत की स्वच्छता बहुत ज़रूरी है।

कटाई, थ्रेशिंग और भंडारण

धान की कटाई सही समय पर करना बहुत ज़रूरी है ताकि दानों की गुणवत्ता और उपज बनी रहे। जब 80-85% बालियाँ पीली पड़ जाएँ और दाने कठोर हो जाएँ, तब कटाई का उचित समय होता है। कटाई में देरी से दाने झड़ सकते हैं और पक्षियों द्वारा नुकसान हो सकता है। आमतौर पर, कटाई हाथ से दरांती से, या कंबाईन हार्वेस्टर से की जाती है। बड़े खेतों के लिए कंबाईन हार्वेस्टर सबसे कुशल और तेज़ विकल्प है। कटाई के बाद धान को थ्रेशिंग के लिए तैयार किया जाता है। थ्रेशिंग मैन्युअल रूप से, बैलों की मदद से, या थ्रेशर मशीन द्वारा की जा सकती है। थ्रेशिंग करते समय यह सुनिश्चित करें कि दानें पूरी तरह से भूसे से अलग हो जाएँ और उनमें कोई अशुद्धता न हो। भंडारण से पहले धान को अच्छी तरह सुखाना बहुत ज़रूरी है। दानों में नमी का स्तर 12-14% से अधिक नहीं होना चाहिए। नमी ज़्यादा होने पर फफूंद लगने और कीटों के पनपने का खतरा रहता है, जिससे दानों की गुणवत्ता खराब हो सकती है। धान को हवादार और नमी रहित जगह पर भंडारित करें। भंडारण के लिए जूट की बोरियों या बड़े गोदामों का उपयोग किया जा सकता है। सरकारी गोदामों में भंडारण के लिए उचित शुल्क देकर सुविधाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।

सही कटाई और भंडारण विधियाँ न केवल उपज के नुकसान को कम करती हैं बल्कि धान की गुणवत्ता को बनाए रखने में भी मदद करती हैं, जिससे किसानों को बाज़ार में बेहतर मूल्य मिल पाता है।

  • 80-85% बालियाँ पीली होने पर कटाई करें।
  • कंबाईन हार्वेस्टर बड़े खेतों के लिए कुशल है।
  • थ्रेशिंग के बाद दानों में अशुद्धियाँ न हों।
  • भंडारण से पहले दानों में नमी 12-14% से अधिक न हो।
  • हवादार और नमी रहित जगह पर भंडारित करें।

धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी योजनाएं

भारत सरकार किसानों को उनकी फ़सल का उचित मूल्य दिलाने और उन्हें नुकसान से बचाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली लागू करती है। हर साल, सरकार धान सहित खरीफ और रबी की कई फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है। यह वह न्यूनतम मूल्य होता है जिस पर सरकार किसानों से फ़सल खरीदती है, भले ही बाज़ार मूल्य इससे कम क्यों न हो। नवीनतम घोषणाओं के अनुसार, खरीफ मार्केटिंग सीज़न 2023-24 के लिए धान (ग्रेड ए) का एमएसपी ₹2203 प्रति क्विंटल और सामान्य धान का एमएसपी ₹2183 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। यह एमएसपी किसानों को उनकी उत्पादन लागत के मुकाबले एक सुरक्षित आय सुनिश्चित करता है। किसानों को एमएसपी पर अपनी फ़सल बेचने के लिए राज्य सरकार की खरीद एजेंसियों या भारतीय खाद्य निगम (FCI) के खरीद केंद्रों पर पंजीकरण कराना होता है। एमएसपी के अलावा, सरकार किसानों की मदद के लिए विभिन्न योजनाएं भी चलाती है। 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' किसानों को प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों से होने वाले फसल नुकसान के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करती है। 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना' के तहत छोटे और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष ₹6000 की वित्तीय सहायता दी जाती है। 'परंपरागत कृषि विकास योजना' और 'राष्ट्रीय कृषि विकास योजना' जैसी योजनाएं भी कृषि के समग्र विकास और किसानों की आय बढ़ाने पर केंद्रित हैं। इन योजनाओं का लाभ उठाकर किसान अपनी खेती को और अधिक सुदृढ़ बना सकते हैं।

सरकार द्वारा किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य के साथ कई नई योजनाएं भी शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य कृषि उत्पादन में वृद्धि, लागत में कमी और बाज़ार तक बेहतर पहुँच प्रदान करना है। किसानों को इन योजनाओं के बारे में जानकारी रखनी चाहिए और उनका लाभ उठाना चाहिए।

  • MSP किसानों को नुकसान से बचाने के लिए न्यूनतम मूल्य है।
  • 2023-24 के लिए धान (ग्रेड ए) का MSP ₹2203/क्विंटल, सामान्य धान का ₹2183/क्विंटल।
  • MSP पर फ़सल बेचने के लिए खरीद केंद्रों पर पंजीकरण करें।
  • 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' फसल नुकसान से सुरक्षा देती है।
  • 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि' से ₹6000/वर्ष वित्तीय सहायता।
धान की खेतीचावल उत्पादनPaddy Farmingधान की किस्मेंSRI विधिMSP धानफसल बीमा योजनाकिसानों के लिए जानकारी

लेखक एवं समीक्षक

अकु

डॉ. अनिल कुमार वर्मा

मुख्य कृषि संपादक

Ph.D. कृषि विज्ञान (Agronomy), G.B. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

22+ वर्ष अनुभव पंतनगर, उत्तराखंड

डॉ. वर्मा को फसल उत्पादन, मृदा प्रबंधन और सिंचाई तकनीकों में 22 वर्षों का शोध अनुभव है। वे ICAR की कई परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं और किसान मित्र की संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया का नेतृत्व करते हैं।

यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 6 जून 2026

संपादकीय टीम से संपर्क करें

स्रोत एवं संदर्भ

  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — फसल उत्पादन तकनीक दिशानिर्देश ICAR, नई दिल्ली
  2. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — योजना दस्तावेज़ भारत सरकार
  3. कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) — विस्तार सेवाएँ ICAR-ATARI

यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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