सरसों की खेती और बंपर पैदावार के 10 राज
सरसों की बंपर पैदावार के लिए बुवाई का सही समय, उत्तम किस्में, खाद प्रबंधन और कीट नियंत्रण की वैज्ञानिक विधियाँ।
विषय-सूची
- 1. सरसों की खेती का महत्व
- 2. सरसों की उन्नत किस्में और उनका चुनाव
- 3. बुवाई का सही समय और तरीका
- 4. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
- 5. सिंचाई का महत्व और सही तरीका
- 6. कीट एवं रोग नियंत्रण
- 7. कटाई और तेल की मात्रा
- 8. सरसों की उपज और बाजार भाव
- 9. गेहूं के साथ सह-फसल (इंटरक्रॉपिंग) - अतिरिक्त आय का जरिया
- 10. बंपर पैदावार के लिए कुछ अतिरिक्त सुझाव
सरसों की खेती का महत्व
भारत में सरसों की खेती का बहुत पुराना इतिहास है और यह रबी की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है। सरसों का उपयोग न केवल तेल निकालने के लिए किया जाता है, बल्कि इसका पत्ता हरी सब्जी के रूप में, खली पशुओं के चारे के लिए और फूलों से शहद भी बनाया जाता है। सरसों का तेल हमारे दैनिक आहार का एक अभिन्न अंग है और इसका उपयोग खाना पकाने के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियों में भी होता है।
आजकल सरसों की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय बन गई है, क्योंकि इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है और सरकार भी तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। पिछले कुछ वर्षों में, नई उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाने से सरसों की प्रति एकड़ पैदावार में काफी वृद्धि हुई है। किसान भाई अब पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। यह लेख आपको सरसों की बंपर पैदावार लेने के लिए कुछ महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव देगा।
सरसों की उन्नत किस्में और उनका चुनाव
अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चुनाव करना बहुत जरूरी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों ने कई उन्नत किस्में विकसित की हैं जो अधिक उपज और रोगों के प्रति प्रतिरोधी हैं। प्रमुख किस्में जो उत्तर भारत के किसानों के बीच लोकप्रिय हैं, उनमें 'पूसा बोल्ड', 'आरएच-30', 'वरुणा' (टी-59), 'पूसा जय किसान', 'एनआरसीएचबी-101' और 'गिरिराज' (एनआरसीएचबी-506) शामिल हैं। 'पूसा बोल्ड' अपनी उच्च तेल सामग्री (40-42%) और बेहतर उपज (10-12 क्विंटल प्रति एकड़) के लिए जानी जाती है।
'आरएच-30' एक मध्यम अवधि की किस्म है जो लगभग 130-140 दिनों में पक जाती है और 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ की उपज देती है। 'वरुणा' भी एक पुरानी और विश्वसनीय किस्म है जिसकी उपज क्षमता 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ है। किस्मों का चुनाव करते समय आपको अपनी मिट्टी के प्रकार, सिंचाई की उपलब्धता और आपके क्षेत्र में प्रचलित कीटों व रोगों को ध्यान में रखना चाहिए। हाइब्रिड किस्में जैसे 'पायनियर 45S42' और 'श्रीराम 1666' भी अधिक उपज देने वाली हैं, लेकिन इनकी लागत थोड़ी अधिक होती है। अपने कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर अपने क्षेत्र के लिए सबसे उपयुक्त किस्म का चयन करें।
बीज की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें। हमेशा प्रमाणित बीज ही खरीदें ताकि फसल अच्छी हो और रोगों से बची रहे। बुवाई से पहले बीज को फफूंदनाशक दवा जैसे थायरम या मैन्कोजेब से उपचारित करना चाहिए ताकि बीज जनित रोगों से बचाव हो सके। यह लगभग 2.5-3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज के लिए पर्याप्त है।
बुवाई का सही समय और तरीका
सरसों की अच्छी फसल के लिए बुवाई का समय बहुत महत्वपूर्ण है। उत्तर भारत में इसकी बुवाई का आदर्श समय अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक होता है। अगेती बुवाई से एफिड (मोयला) जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है, जबकि पछेती बुवाई से उपज में कमी आ सकती है। सही समय पर बुवाई करने से पौधों को शुरुआती विकास के लिए पर्याप्त अनुकूल तापमान मिलता है।
बुवाई के लिए, प्रति एकड़ 1.5 से 2 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। यदि आप पंक्ति में बुवाई कर रहे हैं, तो पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। छिड़काव विधि की बजाय पंक्ति में बुवाई करना बेहतर होता है क्योंकि इससे निराई-गुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण और पौधों को पर्याप्त जगह मिलती है। बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह से तैयारी करनी चाहिए, जिसमें 2-3 गहरी जुताई और पाटा लगाना शामिल है जिससे खेत समतल हो जाए और मिट्टी भुरभुरी हो जाए। बुवाई के बाद बीज को 2-3 सेंटीमीटर मिट्टी से ढक देना चाहिए।
मिट्टी की उर्वरता के आधार पर, बुवाई के समय रासायनिक खाद का प्रयोग करना भी महत्वपूर्ण है। आमतौर पर, प्रति एकड़ 20 किलो यूरिया, 60 किलो डीएपी और 20 किलो पोटाश की सिफारिश की जाती है। बुवाई से पहले गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग भी मिट्टी की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
सरसों की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित खाद प्रबंधन बहुत जरूरी है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद की मात्रा तय करना सबसे वैज्ञानिक तरीका है। सामान्य तौर पर, प्रति एकड़ 60-80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30-40 किलोग्राम फास्फोरस और 20-30 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय अंतिम जुताई के दौरान खेत में मिला देनी चाहिए। सल्फर की कमी सरसों की फसल के लिए हानिकारक होती है, इसलिए प्रति एकड़ 20 किलो सल्फर (जिप्सम या बेंटोनाइट सल्फर के रूप में) का प्रयोग भी फायदेमंद होता है, खासकर जहां तेल की मात्रा बढ़ाने की जरूरत हो।
शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा को बुवाई के 30-40 दिन बाद पहली सिंचाई के साथ यूरिया के रूप में देना चाहिए। इससे पौधों का वानस्पतिक विकास तेजी से होता है और फूल आने की अवस्था में पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता रहता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए बोरॉन और जिंक का प्रयोग भी आवश्यक हो सकता है। बोरॉन की कमी से फलियों में दाने नहीं बनते या कम बनते हैं, इसलिए 200 ग्राम बोरॉन प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में घोलकर फूल आने से पहले स्प्रे करना चाहिए।
जैविक खाद जैसे गोबर की खाद, केंचुआ खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग रासायनिक खादों के साथ मिलकर मिट्टी की संरचना और उर्वरता में सुधार करता है, जिससे रासायनिक खादों की दक्षता बढ़ती है और मिट्टी का स्वास्थ्य बना रहता है। प्रति एकड़ 5-10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग बुवाई से 15-20 दिन पहले खेत में मिलाना चाहिए।
सिंचाई का महत्व और सही तरीका
सरसों की फसल को सामान्यतः 2-3 सिंचाई की आवश्यकता होती है, जो मिट्टी के प्रकार और जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करती है। पहली हल्की सिंचाई बुवाई के 30-40 दिन बाद करनी चाहिए, जब पौधे में शाखाएं निकलनी शुरू हो जाएं। इस समय खेत में नमी होना बहुत आवश्यक है ताकि पौधों का विकास अच्छा हो सके। आवश्यकता से अधिक पानी देने से बचें, खासकर शुरुआती अवस्था में, क्योंकि इससे जड़ें गल सकती हैं।
दूसरी सिंचाई फूल आने से पहले (लगभग 60-70 दिन बाद) करनी चाहिए। यह अवस्था सरसों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इस समय पौधों को सबसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इस सिंचाई से फूल और फलियों का उचित विकास होता है। यदि मौसम सूखा है या मिट्टी हल्की है, तो फलियों में दाना भरते समय (लगभग 90-100 दिन बाद) तीसरी सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सिंचाई हमेशा हल्की होनी चाहिए और शाम के समय करनी चाहिए, ताकि पानी का वाष्पीकरण कम हो और पौधों को पर्याप्त नमी मिल सके। जिस खेत में गेहूं के साथ सरसों की सह-फसली खेती की जा रही है, वहां गेहूं की सिंचाई के समय सरसों का भी ध्यान रखना चाहिए ताकि दोनों फसलों को पर्याप्त पानी मिले। ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली का उपयोग पानी बचाने और फसल की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है।
कीट एवं रोग नियंत्रण
सरसों की फसल में कई कीट और रोग लग सकते हैं जो पैदावार को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं। एफिड (मोयला) सरसों का सबसे खतरनाक कीट है। यह पत्तियों और फूलों से रस चूसता है, जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उपज कम हो जाती है। इसके नियंत्रण के लिए, बुवाई के 40-50 दिन बाद या एफिड के प्रारंभिक लक्षण दिखने पर इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) 17.8% SL @ 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी या डाइमेथोएट (Dimethoate) 30% EC @ 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें।
सफेद रस्ट (White Rust) सरसों का एक प्रमुख फंगल रोग है जो पत्तियों और तनों पर सफेद, उभरे हुए धब्बे पैदा करता है। इस रोग से बचाव के लिए, प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें और मैनकोजेब (Mancozeb) या मेटलैक्सिल + मैनकोजेब (Metalaxyl + Mancozeb) जैसे फफूंदनाशक का छिड़काव करें। पहला छिड़काव बुवाई के 40-50 दिन बाद और दूसरा छिड़काव आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतराल पर करें। डाउनी मिल्ड्यू और अल्टरनेरिया झुलसा भी अन्य प्रमुख रोग हैं।
खरपतवार नियंत्रण भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि खरपतवार पोषण और पानी के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं। बुवाई के 25-30 दिन बाद निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। रासायनिक खरपतवारनाशकों का भी उपयोग किया जा सकता है, जैसे पेंडीमेथालिन (Pendimethalin) @ 1 लीटर प्रति एकड़ बुवाई के तुरंत बाद, या फ्लुक्लोरालिन (Fluchloralin) @ 1 लीटर प्रति एकड़ बुवाई से पहले मिट्टी में मिलाकर। हमेशा एकीकृत कीट और रोग प्रबंधन (IPM) दृष्टिकोण अपनाएं जिसमें सांस्कृतिक, जैविक और रासायनिक विधियों का संयोजन हो।
कटाई और तेल की मात्रा
सरसों की कटाई तब करनी चाहिए जब फलियां पीली पड़ जाएं और 75-80% दाने पक जाएं। आमतौर पर, यह बुवाई के 120-150 दिन बाद होता है, जो किस्म पर निर्भर करता है। अधिक देर तक खेत में खड़ी रखने से फलियां चटख सकती हैं और दाने बिखर सकते हैं, जिससे पैदावार में भारी नुकसान हो सकता है। सुबह के समय जब नमी होती है, कटाई करना सबसे अच्छा होता है ताकि दानों का नुकसान कम हो।
कटी हुई फसल को छोटे-छोटे गट्ठरों में बांधकर 4-5 दिनों तक धूप में सुखाएं। जब फसल पूरी तरह सूख जाए, तो थ्रेशिंग करके दानों को अलग कर लें। थ्रेशिंग के बाद दानों को अच्छी तरह से साफ करें और नमी 8-9% तक सूखने के बाद ही भण्डारण करें। अधिक नमी वाले दानों के भण्डारण से फफूंद लग सकती है और गुणवत्ता खराब हो सकती है।
सरसों में तेल की मात्रा 38% से 42% तक होती है, जो किस्म और खेती के तरीकों पर निर्भर करती है। 'पूसा बोल्ड' जैसी किस्मों में तेल की मात्रा अच्छी होती है। सल्फर का सही मात्रा में प्रयोग करने से भी तेल की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। तेल की अच्छी मात्रा होने से आपको बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं।
सरसों की उपज और बाजार भाव
वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर सरसों की औसत उपज प्रति एकड़ 8 से 12 क्विंटल तक प्राप्त की जा सकती है। कुछ उन्नत हाइब्रिड किस्में और बेहतर प्रबंधन से यह उपज 15 क्विंटल प्रति एकड़ तक भी पहुंच सकती है। 'पूसा बोल्ड' जैसी किस्में आमतौर पर 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ की उपज देती हैं, जबकि 'आरएच-30' और 'वरुणा' 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ की उपज देती हैं। यह उपज मिट्टी की उर्वरता, सिंचाई की उपलब्धता और कीट-रोग नियंत्रण पर निर्भर करती है।
बाजार में सरसों का भाव विभिन्न कारकों जैसे सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), अंतरराष्ट्रीय बाजार, और मंडियों में मांग व आपूर्ति पर निर्भर करता है। भारत सरकार हर साल सरसों के लिए MSP निर्धारित करती है। उदाहरण के लिए, 2023-24 के लिए सरसों का MSP ₹5,450 प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है।
हालांकि, मंडियों में वास्तविक बाजार भाव MSP से ऊपर या नीचे हो सकता है। सामान्य तौर पर, सरसों का भाव ₹5,000 से ₹6,500 प्रति क्विंटल के बीच रहता है। कटाई के तुरंत बाद भाव थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन कुछ समय बाद मांग बढ़ने पर इसमें वृद्धि भी हो सकती है। अपनी उपज बेचने के लिए सही समय का चुनाव करना भी किसानों के लिए महत्वपूर्ण होता है।
गेहूं के साथ सह-फसल (इंटरक्रॉपिंग) - अतिरिक्त आय का जरिया
किसानों के लिए जोखिम कम करने और आय बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका सह-फसल (इंटरक्रॉपिंग) है। गेहूं के साथ सरसों की सह-फसली खेती उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय है। इस विधि में, किसान एक साथ एक ही खेत में गेहूं और सरसों की बुवाई करते हैं। आमतौर पर, 9 पंक्तियों गेहूं के बाद 1 पंक्ति सरसों की बुवाई की जाती है। यह अनुपात मिट्टी की उर्वरता और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर बदला जा सकता है।
सह-फसली खेती के कई फायदे हैं। इससे प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक आय प्राप्त होती है, क्योंकि यदि एक फसल को नुकसान होता है तो दूसरी फसल उसकी भरपाई कर सकती है। यह विधि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी बनाए रखती है, कीटों और रोगों के प्रकोप को कम करती है, और खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद करती है। सरसों की जड़ें मिट्टी की गहरी परतों से पोषक तत्व ग्रहण करती हैं, जो गेहूं के लिए भी फायदेमंद होता है।
सह-फसली खेती के लिए, आपको ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहिए जिनकी परिपक्वता अवधि लगभग समान हो या जो एक दूसरे के विकास में बाधा न डालें। सिंचाई और खाद प्रबंधन में थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है ताकि दोनों फसलों को पर्याप्त पोषण और पानी मिल सके। इस विधि को अपनाकर किसान अपनी आय को स्थिर और सुरक्षित बना सकते हैं।
बंपर पैदावार के लिए कुछ अतिरिक्त सुझाव
सरसों की बंपर पैदावार के लिए ऊपर बताए गए तरीकों के अलावा कुछ और बातों का ध्यान रखना जरूरी है। बीज उपचार बुवाई से पहले अवश्य करें ताकि शुरुआती रोगों से बचाव हो सके। स्वस्थ पौधों का चयन करें और रोगग्रस्त पौधों को तुरंत खेत से हटा दें।
मिट्टी की जांच नियमित रूप से कराएं ताकि आपको मिट्टी में पोषक तत्वों की सही जानकारी मिल सके और आप उसके अनुसार खाद का प्रयोग कर पाएं। जैविक खादों का प्रयोग बढ़ाएं जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरे और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम हो। पानी का कुशलता से उपयोग करें, खासकर ड्रिप या स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियों को अपनाकर।
मौसम के पूर्वानुमान पर ध्यान दें और उसके अनुसार अपनी खेती की योजना बनाएं। जैसे, पाला पड़ने की आशंका होने पर हल्की सिंचाई करें या धुआं करें। नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करें ताकि कीट या रोग के लक्षणों का पता चलते ही उनका तुरंत उपचार किया जा सके। अपने जिले के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से संपर्क में रहें और उनकी सलाह लेते रहें। इन सभी बातों का ध्यान रखकर आप निश्चित रूप से सरसों की बंपर पैदावार प्राप्त कर सकते हैं और अपनी आय को बढ़ा सकते हैं।
सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कृषि योजनाओं जैसे PM-Kisan, फसल बीमा योजना, और तिलहन विकास कार्यक्रमों का लाभ उठाएं। इन योजनाओं से किसानों को वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन मिलता है, जिससे वे बेहतर खेती कर पाते हैं। सहकारिता समितियों से जुड़कर आप अपनी उपज को बेहतर मूल्य पर बेच सकते हैं और आदानों को सस्ते में प्राप्त कर सकते हैं।
सरसों की खेती का महत्व
भारत में सरसों की खेती का बहुत पुराना इतिहास है और यह रबी की सबसे महत्वपूर्ण तिलहनी फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर की जाती है। सरसों का उपयोग न केवल तेल निकालने के लिए किया जाता है, बल्कि इसका पत्ता हरी सब्जी के रूप में, खली पशुओं के चारे के लिए और फूलों से शहद भी बनाया जाता है। सरसों का तेल हमारे दैनिक आहार का एक अभिन्न अंग है और इसका उपयोग खाना पकाने के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियों में भी होता है।
आजकल सरसों की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय बन गई है, क्योंकि इसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है और सरकार भी तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। पिछले कुछ वर्षों में, नई उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाने से सरसों की प्रति एकड़ पैदावार में काफी वृद्धि हुई है। किसान भाई अब पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं। यह लेख आपको सरसों की बंपर पैदावार लेने के लिए कुछ महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव देगा।
लेखक एवं समीक्षक
डॉ. अनिल कुमार वर्मा
मुख्य कृषि संपादक
Ph.D. कृषि विज्ञान (Agronomy), G.B. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
22+ वर्ष अनुभव पंतनगर, उत्तराखंड
डॉ. वर्मा को फसल उत्पादन, मृदा प्रबंधन और सिंचाई तकनीकों में 22 वर्षों का शोध अनुभव है। वे ICAR की कई परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं और किसान मित्र की संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया का नेतृत्व करते हैं।
यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 2 जून 2026
संपादकीय टीम से संपर्क करेंस्रोत एवं संदर्भ
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) — फसल उत्पादन तकनीक दिशानिर्देश ICAR, नई दिल्ली
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — योजना दस्तावेज़ भारत सरकार
- कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) — विस्तार सेवाएँ ICAR-ATARI
यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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