सरसों की खेती

सरसों की पीली किस्में — पूसा डबल जीरो किस्मों का लाभ

यह लेख सरसों की पीली किस्मों और 'पूसा डबल जीरो' (Pusa Double Zero) किस्मों के बारे में है। हम इन किस्मों के लाभ, खेती के तरीके और सावधानियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

डॉ. अनिल कुमार वर्मा प्रकाशित 14 मार्च 2026 8 मिनट का पठन अपडेट: 14 मार्च 2026

परिचय: सरसों की पीली किस्में और उनका महत्व

भारत में तिलहनी फसलों में सरसों का महत्वपूर्ण स्थान है। यह किसानों की आय का एक प्रमुख स्रोत है और खाद्य तेल उत्पादन में इसकी अहम भूमिका है। विशेष रूप से पीली सरसों की किस्में अपने उच्च तेल प्रतिशत और बेहतर गुणवत्ता के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं। ये किस्में न केवल किसानों को अधिक मुनाफा देती हैं, बल्कि उपभोक्ताओं को भी बेहतर गुणवत्ता वाला तेल प्रदान करती हैं।

पारंपरिक सरसों की किस्मों की तुलना में, पीली सरसों की किस्में जल्दी पकने वाली, अधिक उपज देने वाली और विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं। इन किस्मों में 'पूसा डबल जीरो' (Pusa Double Zero) नाम की एक विशेष श्रेणी है, जिसने भारतीय कृषि में क्रांति ला दी है। इन किस्मों में 'इरुसिक एसिड' और 'ग्लूकोसिनोलेट्स' की मात्रा बहुत कम होती है, जो इन्हें मानव उपभोग और पशुधन दोनों के लिए अत्यंत सुरक्षित बनाती है।

पीली सरसों की उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं

भारत में कई पीली सरसों की किस्में विकसित की गई हैं, जो विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। इन किस्मों का चयन करते समय क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखना चाहिए।

कुछ प्रमुख पीली सरसों की किस्में और उनकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  • पीतांबरी (एनआरसीएचआर-2): यह एक उच्च उपज देने वाली किस्म है जो मध्य और पश्चिमी भारत के लिए उपयुक्त है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 40-42% होती है।
  • एनआरसीएचबी 101: यह संकर किस्म उच्च उपज और रोग प्रतिरोधकता के लिए जानी जाती है। यह लगभग 120-130 दिनों में पक जाती है।
  • पूसा अगेती: यह एक जल्दी पकने वाली किस्म है, जो लगभग 100-110 दिनों में तैयार हो जाती है। यह उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ फसल चक्र बहुत कम होता है।
  • आरएच 749: यह नवीनतम किस्मों में से एक है, जिसमें उच्च तेल प्रतिशत (40-42%) और रोग प्रतिरोधकता की क्षमता है। यह विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए व्यापक रूप से अनुकूल है।
  • लक्ष्मी: यह किस्म विशेष रूप से सूखे और कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए विकसित की गई है और अच्छी उपज देती है।

पूसा डबल जीरो (Pusa Double Zero) किस्में: एक क्रांति

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा, नई दिल्ली ने 'पूसा डबल जीरो' (Pusa Double Zero) नाम से सरसों की कुछ असाधारण किस्में विकसित की हैं। इन किस्मों को 'कैनोला' (Canola) मानक के अनुरूप तैयार किया गया है। 'डबल जीरो' का अर्थ है कि इन किस्मों में 'इरुसिक एसिड' की मात्रा 2% से कम और 'ग्लूकोसिनोलेट्स' की मात्रा 30 माइक्रोमोल प्रति ग्राम से कम होती है।

पारंपरिक सरसों के तेल में इरुसिक एसिड और ग्लूकोसिनोलेट्स की उच्च मात्रा होती है, जो इसे मानव स्वास्थ्य के लिए कुछ हद तक हानिकारक बना सकती है, खासकर यदि इसका नियमित रूप से बड़ी मात्रा में सेवन किया जाए। पूसा डबल जीरो किस्में इन हानिकारक तत्वों को कम करके न केवल तेल की गुणवत्ता में सुधार करती हैं, बल्कि पशु आहार के रूप में खली के उपयोग को भी सुरक्षित बनाती हैं।

पूसा डबल जीरो किस्मों के मुख्य लाभ

पूसा डबल जीरो किस्में किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए कई महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करती हैं। ये लाभ भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक हैं।

  • बेहतर पोषण: कम इरुसिक एसिड के कारण तेल मानव उपभोग के लिए अधिक पौष्टिक और सुरक्षित हो जाता है। यह हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
  • पशुधन के लिए सुरक्षित खली: कम ग्लूकोसिनोलेट्स खली को पशुधन के लिए एक उत्कृष्ट प्रोटीन पूरक बनाता है। इससे पशुधन का स्वास्थ्य और उत्पादकता बढ़ती है।
  • उच्च तेल प्रतिशत: इन किस्मों में आमतौर पर उच्च तेल प्रतिशत (38-42%) होता है, जिससे किसानों को अधिक आर्थिक लाभ मिलता है।
  • रोग और कीट प्रतिरोधकता: पूसा डबल जीरो किस्में अक्सर विभिन्न रोगों और कीटों के प्रति बेहतर प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं, जिससे फसल का नुकसान कम होता है।
  • उच्च उपज क्षमता: इन किस्मों को उच्च उपज के लिए विकसित किया गया है, जिससे प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन प्राप्त होता है।
  • निर्यात की संभावना: 'कैनोला' मानकों को पूरा करने के कारण, इन किस्मों के तेल और खली को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात करने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है।

सरसों की खेती के लिए चरण-दर-चरण विधि

सरसों की खेती में अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण चरणों का पालन करना आवश्यक है।

खेत की तैयारी: अच्छी उपज के लिए दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाएं। पाटा लगाकर मिट्टी को समतल करें और खरपतवारों को नियंत्रित करें।

बीज और बुवाई: स्वस्थ और प्रमाणित बीज का उपयोग करें। बुवाई का सही समय अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा होता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी रखें। बीज की गहराई 2-3 सेमी होनी चाहिए।

खाद और उर्वरक: बुवाई के समय प्रति हेक्टेयर 60-80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-60 किलोग्राम फास्फोरस और 20-30 किलोग्राम पोटाश डालें। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर अवश्य डालें।

सिंचाई: पहली सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद (शाखाएँ निकलने से पहले) और दूसरी सिंचाई फूल आने से पहले (लगभग 60-70 दिन बाद) करें। मिट्टी की नमी के अनुसार अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है।

खरपतवार नियंत्रण: बुवाई के 20-25 दिन बाद निराई-गुड़ाई करें या उपयुक्त शाकनाशक का प्रयोग करें।

कीट और रोग नियंत्रण: एफिड, आरा मक्खी और पत्ती मोड़क जैसे कीटों से बचाव के लिए नीम आधारित कीटनाशकों या आवश्यकतानुसार रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करें। सफेद रतुआ (व्हाइट रस्ट) और डाउनी मिल्ड्यू जैसे रोगों के लिए फफूंदनाशकों का प्रयोग करें।

फसल कटाई और भंडारण: जब फलियाँ पीली पड़ने लगें और दाने सख्त हो जाएं, तो फसल काट लें। कटाई के बाद फसल को धूप में अच्छी तरह सुखाएं और नमी रहित स्थान पर भंडारण करें। कटाई आमतौर पर फरवरी-मार्च में होती है।

सरसों की खेती में सामान्य गलतियाँ और उनसे बचाव

सरसों की खेती करते समय किसान अक्सर कुछ सामान्य गलतियाँ करते हैं, जिनसे उपज और गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन गलतियों से बचना आवश्यक है।

  • गलत किस्म का चुनाव: अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल किस्म का चुनाव न करना एक बड़ी गलती है। हमेशा अपने कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेकर ही किस्म का चुनाव करें।
  • देरी से बुवाई: अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े के बाद बुवाई करने से उपज में भारी कमी आ सकती है। समय पर बुवाई महत्वपूर्ण है।
  • संतुलित पोषण का अभाव: नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की कमी से पैदावार प्रभावित होती है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें।
  • पानी का गलत प्रबंधन: अत्यधिक या अपर्याप्त सिंचाई दोनों ही फसल के लिए हानिकारक हैं। मिट्टी की नमी और फसल की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करें।
  • खरपतवार नियंत्रण में लापरवाही: खरपतवार पोषक तत्वों और पानी के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे उपज घटती है। समय पर खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है।
  • कीट और रोग का कुप्रबंधन: कीटों और रोगों की समय पर पहचान न करना और उनका उचित इलाज न करना बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। नियमित रूप से फसल का निरीक्षण करें और विशेषज्ञों की सलाह लें।
  • अवैज्ञानिक भंडारण: कटाई के बाद फसल को ठीक से न सुखाने और अनुचित भंडारण से उपज का नुकसान हो सकता है। नमी रहित स्थान पर ही भंडारण करें।

विशेषज्ञ सुझाव: अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता के लिए

अधिक उपज और उच्च गुणवत्ता वाली सरसों प्राप्त करने के लिए कुछ अतिरिक्त विशेषज्ञ सुझावों का पालन करें:

बीज उपचार: बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशक और कीटनाशक से उपचारित करें। इससे प्रारंभिक अवस्था में फसल को रोगों और कीटों से बचाया जा सकता है।

कतार में बुवाई: कतारों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई, सिंचाई और कटाई में आसानी होती है, साथ ही पौधों को उचित स्थान मिलता है।

पौधों की छंटाई (थिनिंग): बुवाई के 25-30 दिन बाद, स्वस्थ पौधों को छोड़कर अनावश्यक पौधों को हटा दें। इससे बचे हुए पौधों को उचित पोषण मिलता है और वे बेहतर वृद्धि करते हैं।

जैविक खेती के तरीके: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के साथ-साथ जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट) और जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करें। यह मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करेगा।

पत्ती विश्लेषण: पोषक तत्वों की कमी का पता लगाने के लिए पत्ती विश्लेषण करवाएं और उसके अनुसार पूरक पोषक तत्व दें।

फसल चक्र: एक ही खेत में हर साल सरसों की खेती करने से बचें। फसल चक्र अपनाने से मिट्टी का स्वास्थ्य बना रहता है और कीटों व रोगों का प्रकोप कम होता है।

स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह: किसी भी समस्या या नई तकनीक की जानकारी के लिए अपने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से नियमित संपर्क बनाए रखें।

सावधानियाँ और चुनौतियाँ

सरसों की खेती करते समय कुछ सावधानियों और चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिनके लिए किसानों को तैयार रहना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन: बेमौसम बारिश, पाला और अत्यधिक तापमान सरसों की फसल को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। किसानों को ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए और उपयुक्त किस्मों का चुनाव करना चाहिए।

जल प्रबंधन: पानी की कमी और अत्यधिक पानी दोनों ही फसल के लिए हानिकारक हैं। जल-दक्ष सिंचाई प्रणालियों (जैसे ड्रिप या स्प्रिंकलर) का उपयोग करना चाहिए, जहाँ संभव हो।

कीट और रोग का बढ़ता प्रकोप: नए कीटों और रोगों का उदय एक चुनौती है। किसानों को रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करना चाहिए और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों का पालन करना चाहिए।

बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव: कभी-कभी बाजार में सरसों के दाम में भारी उतार-चढ़ाव देखा जाता है। किसानों को सरकारी नीतियों, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बाजार की मांग पर नजर रखनी चाहिए।

गुणवत्ता मानक: 'पूसा डबल जीरो' जैसी किस्मों के लिए गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि उन्हें बेहतर बाजार मूल्य मिल सके। सही कटाई, प्रसंस्करण और भंडारण विधियों का पालन करना चाहिए।

निष्कर्ष

सरसों की पीली किस्में, विशेष रूप से 'पूसा डबल जीरो' किस्में, भारतीय किसानों के लिए एक सुनहरा अवसर प्रस्तुत करती हैं। ये किस्में न केवल उच्च उपज और बेहतर तेल गुणवत्ता प्रदान करती हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पशुधन पोषण के लिए भी सुरक्षित हैं। सही कृषि पद्धतियों, वैज्ञानिक ज्ञान और विशेषज्ञों की सलाह का पालन करके, किसान इन किस्मों से अधिकतम लाभ उठा सकते हैं और अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं। सरकार और कृषि अनुसंधान संस्थानों के निरंतर प्रयासों से भारतीय कृषि में तिलहनी फसलों का भविष्य उज्ज्वल है, और पीली सरसों इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। किसानों को इन उन्नत किस्मों को अपनाकर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाना चाहिए।

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लेखक एवं समीक्षक

अकु

डॉ. अनिल कुमार वर्मा

मुख्य कृषि संपादक

Ph.D. कृषि विज्ञान (Agronomy), G.B. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

22+ वर्ष अनुभव पंतनगर, उत्तराखंड

डॉ. वर्मा को फसल उत्पादन, मृदा प्रबंधन और सिंचाई तकनीकों में 22 वर्षों का शोध अनुभव है। वे ICAR की कई परियोजनाओं से जुड़े रहे हैं और किसान मित्र की संपादकीय समीक्षा प्रक्रिया का नेतृत्व करते हैं।

यह लेख कृषि विशेषज्ञ द्वारा समीक्षित है। अंतिम समीक्षा: 14 मार्च 2026

संपादकीय टीम से संपर्क करें

स्रोत एवं संदर्भ

  1. सरसों की उन्नत तकनीकें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
  2. रबी तिलहनों के लिए पैकेज अभ्यास कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
  3. सरसों की खेती पर नवीनतम अनुसंधान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा
  4. तिलहन उत्पादन में चुनौतियाँ और अवसर राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (NAARM)
  5. राजस्थान में सरसों की उन्नत किस्में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर

यह लेख ऊपर दिए गए वैज्ञानिक एवं सरकारी स्रोतों के आधार पर तैयार और सत्यापित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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